वन विभाग के कब्जे में कैद हुआ नौगढ़ का ऐतिहासिक चंद्रकांता किला, पर्यटकों के लिए बंद, अधिकारियों का विश्राम स्थल बनकर सिमटा ऐतिहासिक किला

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चंदौली जिले के नौगढ़ कभी इतिहास प्रेमियों, पर्यटकों और विद्यार्थियों के आकर्षण का केंद्र रहा नौगढ़ का ऐतिहासिक चंद्रकांता किला आज अपनी पहचान खोने की कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है। विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेंद्र सिंह की अमर प्रेमगाथा से जुड़ा यह ऐतिहासिक किला अब आम लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वन विभाग के अधीन आने के बाद किले की सुरक्षा तो बढ़ी, लेकिन इसके साथ ही इसके दरवाजे भी आम जनता और पर्यटकों के लिए लगभग बंद हो गए।

किले के आसपास मिले पुरातात्विक अवशेष इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यहां प्राप्त अवशेष लगभग तीन हजार वर्ष पुराने हैं, जो इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं। यह किला कभी पूर्वांचल ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों में अपनी ऐतिहासिक और साहित्यिक पहचान के लिए प्रसिद्ध था। एक समय था जब यहां दूर-दराज से पर्यटक पहुंचते थे। स्कूलों और कॉलेजों के छात्र-छात्राएं शैक्षणिक भ्रमण के लिए यहां आते थे और किले के इतिहास को जानने का प्रयास करते थे। लेकिन वर्तमान में किले के मुख्य द्वार पर लटका ताला आने वाले पर्यटकों का स्वागत नहीं, बल्कि उन्हें लौट जाने का संकेत देता नजर आता है।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि वन विभाग द्वारा किले का रखरखाव तो किया जा रहा है, लेकिन इसके ऐतिहासिक महत्व को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। किले की रंगाई-पुताई और साफ-सफाई समय-समय पर होती है, मगर इसकी ऐतिहासिक विरासत अब बंद दरवाजों के पीछे सिमटकर रह गई है। लोगों का कहना है कि जिस धरोहर को क्षेत्र के पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बनना चाहिए था, वह अब अधिकारियों के विश्राम स्थल और गेस्ट हाउस तक सीमित होकर रह गई है।

हाल ही में कई पर्यटक किला देखने पहुंचे, लेकिन प्रवेश द्वार बंद मिलने के कारण उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ा। पर्यटकों का कहना है कि उन्होंने बचपन से चंद्रकांता किले की कहानियां सुनी थीं और इसके इतिहास को करीब से देखने की इच्छा लेकर नौगढ़ पहुंचे थे, लेकिन उन्हें अंदर प्रवेश तक नहीं मिल सका।

क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब चंद्रकांता किला नौगढ़ की पहचान हुआ करता था। इस किले की चर्चा चंदौली, सोनभद्र, मिर्जापुर और वाराणसी समेत कई जिलों में होती थी। बाबू देवकीनंदन खत्री के प्रसिद्ध उपन्यास “चंद्रकांता” और उस पर बने टीवी धारावाहिक ने इस किले को राष्ट्रीय स्तर तक पहचान दिलाई थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने से भी वंचित हो रही है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में चंद्रकांता किला केवल सरकारी अभिलेखों और किताबों तक सीमित होकर रह जाएगा। किले का गौरवशाली इतिहास, उसकी सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन महत्व धीरे-धीरे समाप्त होता चला जाएगा। लोगों ने प्रशासन और वन विभाग से मांग की है कि किले को निर्धारित समय के लिए नियमित रूप से पर्यटकों के लिए खोला जाए तथा इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए, ताकि नौगढ़ की इस ऐतिहासिक धरोहर की खोती पहचान और लोकप्रियता को फिर से जीवित किया जा सके।

आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चंद्रकांता की प्रेमगाथा का साक्षी यह ऐतिहासिक किला फिर से पर्यटकों की चहल-पहल देख पाएगा, या फिर इसकी कहानी बंद दरवाजों और सरकारी ताले के पीछे ही सिमटकर रह जाएगी।

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