अमित मिश्रा
O- सोनभद्र में ‘विकास बनाम विस्थापन’ की जंग: PSP परियोजनाओं पर उबाल, 3,147 हेक्टेयर भूमि और लाखों पेड़ों पर संकट
O- किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा बोले- जंगल, जल और जमीन की कीमत पर विकास स्वीकार नहीं
O- “सोनभद्र में विकास की कीमत पर सवाल: 3,147 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण के खिलाफ फूटा जनाक्रोश”
सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) । देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले सोनभद्र में प्रस्तावित पंप्ड स्टोरेज पावर (PSP) परियोजनाओं को लेकर बड़ा जनआंदोलन आकार लेने लगा है। हजारों हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण और बड़े पैमाने पर संभावित वृक्ष कटान को लेकर ग्रामीणों, आदिवासियों और किसान संगठनों में गहरा आक्रोश है। किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर परियोजनाओं के खिलाफ चल रहे विरोध को खुला समर्थन दिया और इसे “पर्यावरण, आजीविका और अस्तित्व की लड़ाई” बताया।

संदीप मिश्रा ने कहा कि “एक ओर देश में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए “पेड़ है तो प्राण है” और “एक पेड़ मां के नाम” जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोनभद्र की पहाड़ियों और घने जंगलों में हजारों पेड़ों की कटाई की तैयारी की जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि परियोजनाओं की समीक्षा नहीं हुई तो यह क्षेत्र पर्यावरणीय असंतुलन और सामाजिक विस्थापन की बड़ी त्रासदी का सामना कर सकता है।”
3,147 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित हैं परियोजनाएं
किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के अनुसार जिले में विभिन्न कंपनियों द्वारा प्रस्तावित पीएसपी परियोजनाओं के लिए कुल 3,147 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई है। इनमें:
- ग्रीनको – 700 हेक्टेयर
- जेएसडब्ल्यू – 575 हेक्टेयर
- अडानी – 237 हेक्टेयर
- अबाडा – 275 हेक्टेयर
- अमुनोरा – 334 हेक्टेयर
- टोरेंट सशनई – 375 हेक्टेयर
- टोरेंट शोमा – 350 हेक्टेयर
- टीएचडीसी – 301 हेक्टेयर
भूमि अधिग्रहण की इस प्रक्रिया से हजारों ग्रामीण परिवारों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
आदिवासी और वनवासी समुदायों में बढ़ी चिंता
प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित परियोजनाओं से उनकी खेती, पशुपालन, वन संसाधनों और जल स्रोतों पर सीधा असर पड़ेगा। उनका आरोप है कि जिन जमीनों पर पीढ़ियों से उनका जीवन निर्भर है, वही अब औद्योगिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की जा रही हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि विकास का विरोध नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर जंगल, जल, जमीन और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती।

“सोनभद्र की पहचान दांव पर”
संदीप मिश्रा ने कहा, “यह केवल जमीन का मामला नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य, पर्यावरण और सोनभद्र की पहचान का सवाल है। हम ग्रामीणों की आवाज जिला मुख्यालय से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक पहुंचाएंगे। किसी भी गरीब का आशियाना उजड़ने नहीं दिया जाएगा और न ही ऐसी परियोजनाओं को स्वीकार किया जाएगा जो जनता के हितों के खिलाफ हों।”
उन्होंने कहा कि यदि सरकार और कंपनियां स्थानीय जनता की सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव और पुनर्वास के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेतीं, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

राष्ट्रीय बहस का विषय बना सवाल
सोनभद्र में उठ रहे विरोध ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों, जल स्रोतों और हजारों ग्रामीण परिवारों के भविष्य की कीमत चुकाई जाएगी, या फिर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ा जाएगा?
इस दौरान रामसूरत खरवार, लक्षन खरवार, योगेन्द्र, विन्दू खरवार, मुखलाल चेरो, राधा पनिका, गीता, मनोज निषाद, राजू पासवान सहित हजारों की संख्या में आदिवासी, वनवासी एवं ग्रामीण परिवार मौजूद रहे।






