कनहर परियोजना का विस्थापन दर्द, बरखोहरा की शांति देवी बोलीं, डूब तो जाएंगे, पर घर छोड़कर नहीं जाएंगे

👇खबर सुनने के लिए प्ले बटन दबाएं

जितेंद्र अग्रहरी

दुद्धी (सोनभद्र) । डूबता घर, बुझती उम्मीदें, आंखों में आंसू और दिल में सवाल, बरखोहरा गांव की बुजुर्ग शांति देवी की कहानी किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों बेघर होते सपनों की चीख है, जो आज भी सरकारी फाइलों में गुम हैं।

कहां जाएं साहब? हमारा घर डूब रहा है, पर हमें अभी तक विस्थापित नहीं माना गया।

बरखोहरा गांव के कसीयवा खाड़ टोला की 65 वर्षीय शांति देवी यह सवाल आज भी हर अफसर से पूछती हैं, लेकिन जवाब सिर्फ आश्वासन में मिलता है। कनहर सिंचाई परियोजना के डूब क्षेत्र में आने के बाद उनका घर चारों तरफ से पानी से घिर चुका है। दरवाजे के बाहर बाढ़ का पानी लहराता है और भीतर जिंदगी की लड़ाई चल रही है।

तीन पीढ़ियों का बसेरा, पर आज भी ठिकाना नहीं

बरखोहरा गांव में शांति देवी का परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से बसा है। पति की बरसों पहले मौत हो गई, बड़ा बेटा संतोष भी असमय चल बसा। संतोष की विधवा पत्नी और उनके तीन छोटे बच्चे शांति देवी के साथ उसी पुराने, जर्जर मकान में रहते हैं। बाकी बेटे, शिव कुमार, राजू कुमार और सुशील कुमार भी अपने परिवारों के साथ उसी घर की दीवारों में टिकी उम्मीदें लिए दिन काट रहे हैं। 15 लोगों का यह परिवार हर पल जलस्तर बढ़ने की दहशत में जी रहा है।

सिर्फ एक रास्ता बचा है, वो भी कभी भी डूब सकता है

शिव कुमार बताते हैं, बारिश के बाद घर तक आने-जाने का बस एक ही रास्ता बचा है। अगर पानी थोड़ा और बढ़ा तो पूरा मकान डूब जाएगा। अफसरों ने कह दिया, हटो यहां से, पर हम जाएं तो जाएं कहां?

सरकारी सूची से गायब, पर जमीन पर हकीकत कायम

शांति देवी का सवाल हर बार ताजगी से उठता है, हमें विस्थापितों की सूची में क्यों नहीं रखा गया? क्या हम इंसान नहीं हैं? क्या हमारा दर्द दिखाई नहीं देता?

परिवार का आरोप है कि सर्वे में गड़बड़ी कर दी गई। जो सालों से यहां बसे हैं, उनका नाम लिस्ट में नहीं, और जो अभी बसे हैं, वे मुआवजा ले चुके।

मर जाएंगे, पर घर छोड़कर नहीं जाएंगे

परिवार के सबसे छोटे बेटे सुशील कुमार की बात में गुस्सा और बेबसी दोनों झलकते हैं।

सरकार का कहना है डूब क्षेत्र छोड़ो, पर हम बिना अधिकार और मुआवजा कहां जाएं? अगर पानी में डूब भी गए तो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

गांव का 70% हिस्सा डूब में, फिर भी अधिकारी बेखबर

बरखोहरा गांव के प्रधान पति सुरजमन यादव भी मानते हैं कि शांति देवी का परिवार दशकों से यहीं रह रहा है। वे कहते हैं, सर्वे में भारी लापरवाही हुई है। जिनका अधिकार बनता है, उन्हें विस्थापितों की सूची में जोड़ा जाए।

46 साल से अधूरी कनहर परियोजना, अधूरे सपने

1978 में शुरू हुई कनहर सिंचाई परियोजना का दर्द अभी तक खत्म नहीं हुआ। तीन राज्यों के 21 गांव डूब क्षेत्र में हैं। अब तक चार बार सर्वे हुए, हजारों को मुआवजा मिला, पर सैकड़ों परिवार आज भी अदृश्य हैं। अधिकारियों के मुताबिक 97% भूमि खाली कराई जा चुकी है, लेकिन हकीकत में गांव-गांव में डूब के साये तैर रहे हैं।

फॉर्म भरो, कार्रवाई होगी, क्या यही जवाब काफी है?

सिंचाई विभाग का कहना है कि छूटे परिवार फॉर्म 6 भरें, जांच के बाद कार्रवाई होगी। लेकिन ग्रामीणों का दर्द यह है कि फॉर्म, जांच और आश्वासन सालों से चल रहे हैं, पर उनके घरों में पानी घुस रहा है, समाधान नहीं।

प्रशासन बोले, जांच कराएंगे, न्याय मिलेगा

उपजिलाधिकारी निखिल यादव ने कहा,
ऐसी कई शिकायतें सामने आई हैं। हम राजस्व विभाग और कनहर परियोजना के अधिकारियों से जांच कराएंगे। पात्रों को शासनादेश के अनुसार हर संभव मदद दी जाएगी।

सवाल बाकी है: कब मिलेगा इंसाफ ?

शांति देवी की आंखें डबडबाई हैं। उनका चेहरा सवाल पूछ रहा है, साहब, क्या सच में हमें इंसाफ मिलेगा? या हमारा घर, हमारी जमीन, हमारी पहचान सब पानी में बह जाएगी?

कनहर परियोजना सिर्फ एक सिंचाई योजना नहीं, यह उन सैकड़ों परिवारों की जिंदगियों का सवाल है, जो हर साल डूबते है, पर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

जिन्हें उजाड़ा जा रहा है, क्या उनका नाम सरकारी फाइलों में कभी शामिल होगा? या ये परिवार यूं ही डूबते सपनों के साथ गुमनाम रहेंगे?

Leave a Comment

1387
वोट करें

भारत की राजधानी क्या है?