एआरटीओ दफ्तर के सामने इंसानियत शर्मसार, ब्लड कैंसर से जूझ रहे बच्चों के माता-पिता सड़क पर बैठे, अफसरों ने झांकना भी जरूरी नहीं समझा

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अमित मिश्रा

सोनभद्र (उत्तरप्रदेश) । वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर मंगलवार को एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। ब्लड कैंसर से जूझ रहे अपने दो मासूम बच्चों का इलाज कराने के लिए कर्ज लेकर ऑटो चलाने वाले दंपति को पुलिस ने चालान थमा दिया। परिवार का आरोप है कि आसपास चल रहे अन्य ऑटो चालकों को छोड़ सिर्फ उनके वाहन पर कार्रवाई की गई। विरोध करने पर भी राहत नहीं मिली तो लाचार माता-पिता अपने बीमार बच्चों को साथ लेकर सीधे एआरटीओ कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गए।

पीड़ित दंपति का कहना है कि उनके दोनों बच्चे ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे हैं। इलाज में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं। परिवार ने रिश्तेदारों और बैंकों से कर्ज लेकर ऑटो खरीदा ताकि मेहनत-मजदूरी कर बच्चों की जिंदगी बचाई जा सके। लेकिन जिस ऑटो से घर चलता है और बच्चों का इलाज होता है, उसी पर पुलिस ने चालान कर दिया।

परिवार का आरोप है कि यदि नियमों का पालन कराया जा रहा था तो वहां मौजूद सभी ऑटो चालकों पर समान कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिर सिर्फ उसी परिवार को क्यों निशाना बनाया गया, जो पहले से जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है? पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि अपनी मजबूरी बताने के बावजूद पुलिस ने कोई मानवीय संवेदनशीलता नहीं दिखाई।

न्याय की मांग को लेकर दंपति अपने दोनों बीमार बच्चों के साथ एआरटीओ कार्यालय के सामने धरने पर बैठ गया। सड़क किनारे बैठे बच्चों और रोते-बिलखते माता-पिता को देखकर राहगीर भी भावुक हो गए। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और काफी देर तक समझाने का प्रयास किया। आश्वासन मिलने के बाद परिवार ने धरना समाप्त कर दिया।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल पुलिस नहीं, प्रशासन पर खड़ा हुआ। जिस एआरटीओ कार्यालय के ठीक सामने पीड़ित परिवार घंटों धरने पर बैठा रहा, वहां से न तो कोई एआरटीओ अधिकारी बाहर निकला और न ही किसी कर्मचारी ने पीड़ित परिवार का हाल जानना जरूरी समझा। यह सवाल अब लोगों के बीच चर्चा का विषय है कि क्या सरकारी कार्यालयों की संवेदनशीलता इतनी खत्म हो चुकी है कि ब्लड कैंसर से जूझ रहे बच्चों का दर्द भी उन्हें अपनी कुर्सी से बाहर नहीं ला सका?

यह मामला केवल एक चालान का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार की भी परीक्षा बन गया है। यदि चालान नियमों के तहत किया गया, तो भी क्या ऐसी परिस्थितियों में पीड़ित परिवार की बात सुनना और समाधान निकालना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं थी? क्या नियमों के साथ मानवीय संवेदना का भी कोई स्थान होना चाहिए या नहीं?

फिलहाल पुलिस का कहना है कि कार्रवाई यातायात नियमों के तहत की गई है। वहीं पीड़ित परिवार निष्पक्ष जांच, चालान की समीक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब की मांग कर रहा है। इस घटना ने प्रशासनिक कार्यशैली और आम नागरिकों के प्रति सरकारी तंत्र के व्यवहार पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

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