नवीन कुमार
सार्वजनिक शौचालय की पानी टंकी टूटी, नल सूखे, सीटों पर गंदगी का अंबार
कोन (सोनभद्र/उत्तर प्रदेश)। नीति आयोग द्वारा आकांक्षी जनपद में शिक्षा , स्वास्थ्य और विकास कार्यो को लेकर बराबर समीक्षा किया जाता है। इसके बावजूद भी ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता अभियान की स्थित बदहाल है।
केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच मुक्त बनाने के उद्देश्य से लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए सामुदायिक शौचालयों की हकीकत ग्राम पंचायत पिपरखाड़ के केवाल टोला में देखने को मिल रही है। यहां सार्वजनिक शौचालय पूरी तरह बदहाल स्थिति में है। शौचालय की पानी की टंकी टूटी पड़ी है, नलों में पानी नहीं आ रहा है और सीटों पर गंदगी का अंबार लगा हुआ है। हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कई महीनों से शौचालय की नियमित सफाई तक नहीं कराई गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की ओर से इस सामुदायिक शौचालय की देखरेख के लिए गांव के ही एक केयर टेकर की नियुक्ति की गई है, जिसे प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय दिया जाता है। इसके अलावा तीन हजार रुपये प्रतिमाह सफाई एवं मरम्मत सामग्री की खरीद के लिए भी उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बावजूद शौचालय की दुर्दशा कई सवाल खड़े कर रही है। यदि नियमित रूप से मानदेय और रखरखाव की धनराशि खर्च हो रही है तो शौचालय की यह स्थिति आखिर क्यों है?
बरसात के मौसम में शौचालय के उपयोग योग्य न होने से ग्रामीणों को मजबूर होकर खेतों का रुख करना पड़ रहा है। ऐसे में जहरीले सांप, बिच्छू व अन्य विषैले जीव-जंतुओं का खतरा बना रहता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थिति किसी बड़ी दुर्घटना को भी आमंत्रित कर सकती है।
स्थानीय निवासी सूर्या त्रिपाठी ने बताया कि शौचालय की बदहाली की शिकायत संबंधित अधिकारियों से कई बार की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारी मामले को गंभीरता से लेने के बजाय आंखें मूंदे बैठे हैं, जिससे सरकारी धन के उपयोग और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए, शौचालय को तत्काल उपयोग योग्य बनाया जाए तथा यदि रखरखाव में लापरवाही या वित्तीय अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि स्वच्छ भारत मिशन के उद्देश्य को धरातल पर साकार किया जा सके।






