राष्ट्रीय पर्वों के बाद फिर वीरान हो जाता है गांधी मैदान

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O- कभी खेल संस्कृति की पहचान रहा मैदान अब असामाजिक गतिविधियों का केंद्र

O- ओबरा का गांधी मैदान बदहाली की कगार पर, खेल संस्कृति से नशे की अंधेरी राह तक पहुँची स्थिति

ओबरा (सोनभद्र)। कभी ओबरा नगर की पहचान माना जाने वाला गांधी मैदान आज उपेक्षा, गंदगी और प्रशासनिक लापरवाही की जीवंत मिसाल बन चुका है। तापीय विद्युत परियोजना के संरक्षण में विकसित यह मैदान वर्षों तक गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों का गौरवपूर्ण केंद्र रहा है। परियोजना स्थापना के शुरुआती दौर में यह मैदान खेल, संस्कृति और सामुदायिक गतिविधियों का प्रमुख स्थल बनाया गया था, लेकिन आज इसकी दशा लगातार गिरते स्तर को बयां कर रही है।

मैदान में चारों ओर फैला कचरा, शराब की बोतलें, नशीले पदार्थों के पैकेट, टूटे-बिखरे ढांचे और घनी झाड़ियाँ इस ओर इशारा करती हैं कि रखरखाव के लिए मिलने वाली धनराशि का उपयोग सही ढंग से नहीं हो रहा। साफ-सफाई केवल राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन से पहले ही की जाती है, जबकि बाकी समय मैदान पूरी तरह से उपेक्षा का शिकार बना रहता है।

समय के साथ विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन खेल मैदानों से उनका दूर होना एक गंभीर सामाजिक चिंता बन चुका है। मैदान, जो कभी बच्चों और युवाओं में ऊर्जा और अनुशासन का केंद्र था, आज नशे जैसी हानिकारक गतिविधियों का अड्डा बनता जा रहा है। नाबालिगों में नशे की लत बढ़ना केवल खराब व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि तापीय विद्युत परियोजना, जिसके अंतर्गत मैदान का संरक्षण होता है, रखरखाव को लेकर गंभीरता क्यों नहीं दिखा रही? हर वर्ष धनराशि जारी होती है, फिर भी मैदान की स्थिति जस की तस बनी हुई है। इसका सीधा प्रभाव न केवल खेल संस्कृति पर, बल्कि समाज के समग्र विकास पर भी पड़ रहा है।

सोन चेतना सामाजिक संगठन का कहना है कि गांधी मैदान की खराब हालत एक बड़े सामाजिक बदलते नजरिये को भी दर्शाती है। लोग समस्याओं को देखकर भी चुप रहना आसान समझते हैं। यही उदासीनता वर्षों से मैदान की दुर्दशा को बढ़ाती रही है।
संगठन का मानना है कि गांधी मैदान केवल एक खेल स्थल नहीं, बल्कि नगर की सांस्कृतिक धरोहर है, जिसका संरक्षण हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

अब जरूरी है कि समुदाय, सामाजिक संगठन और प्रशासन मिलकर मैदान के पुनर्विकास का संकल्प लें।
धनराशि का पारदर्शी उपयोग हो, असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगे, और बच्चों व युवाओं को फिर से खेल से जोड़ा जाए।
यदि प्रयास समय से नहीं किए गए, तो ओबरा का यह ऐतिहासिक मैदान अपनी पहचान पूरी तरह से खो देगा।

सोन चेतना सामाजिक संगठन ने नगरवासियों से अपील की है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से उठाएँ और गांधी मैदान को उसकी पुरानी गरिमा वापस दिलाने में सहयोग करें।

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