अमित मिश्रा
O- एक ही ज़मीन को दो रिपोर्टों में बताया कभी ‘सरकारी’, कभी ‘काश्त योग्य’, नामांतरण रिपोर्ट के बदले लेखपाल पर ₹1 लाख रिश्वत मांगने का गंभीर आरोप
सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) । जनपद से राजस्व विभाग को कठघरे में खड़ा करने वाला एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। ज़मीन के नामांतरण (Mutation) की प्रक्रिया में लेखपाल द्वारा खुलेआम ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) की मांग, और एक ही भूमि पर दो विरोधाभासी रिपोर्ट लगाने का आरोप लगा है। दस्तावेज़ बताते हैं कि कभी उसी भूमि को सरकारी बताया गया, तो कभी काश्त की भूमि घोषित कर दिया गया।
पूरा मामला क्या है? (दस्तावेज़ों के आधार पर)
प्राप्त प्रार्थना पत्रों और राजस्व अभिलेखों के अनुसार,
- प्रार्थी द्वारा खरीदी गई भूमि का विधिवत बैनामा पंजीकृत है
- नामांतरण हेतु मामला तहसील न्यायालय में विचाराधीन था
- न्यायालय से लेखपाल रिपोर्ट (धारा 34, यूपी राजस्व संहिता 2006) मांगी गई
यहीं से खेल शुरू हुआ।
₹1 लाख की मांग का आरोप
दस्तावेज़ों में स्पष्ट उल्लेख है कि-
- लेखपाल ने नामांतरण रिपोर्ट न्यायालय में भेजने के बदले
₹1,00,000 खर्च/रिश्वत की मांग की - यह भी कहा गया कि यदि पैसा नहीं दिया गया तो“ऐसी रिपोर्ट भेज दी जाएगी कि नामांतरण कभी नहीं हो पाएगा”
प्रार्थी के अनुसार, लेखपाल ने यह भी दावा किया कि-
- SDM, अन्य अधिकारी और पूरा सिस्टम खर्च मांगता है
- “कम पैसे में सही रिपोर्ट नहीं लगती”
सबसे बड़ा विरोधाभास: एक ही ज़मीन, दो रिपोर्ट
यही मामला सबसे गंभीर और राष्ट्रीय महत्व का बन जाता है-
🔹 रिपोर्ट – 1
- भूमि को सरकारी / रास्ता / अनुपयोगी बताया गया
- नामांतरण रोकने की संस्तुति
🔹 रिपोर्ट – 2
- उसी भूमि को
- काश्त योग्य
- निजी कब्जे की
- नामांतरण योग्य बताया गया
सवाल यह है कि-
एक ही खसरा संख्या, एक ही स्थान, एक ही सीमांकन…
तो ज़मीन की प्रकृति दो अलग-अलग कैसे हो सकती है?
पुराने मामलों से भी खुलासा
दस्तावेज़ों में यह भी सामने आया है कि-
- इसी खसरा/आराजी पर पहले भी नामांतरण हो चुका है
- पूर्व बैनामों में लेखपाल द्वारा सही रिपोर्ट दी गई
- तब भूमि को सरकारी नहीं बताया गया
यानी ज़मीन की प्रकृति स्थिति के अनुसार बदली गई -जो सीधे-सीधे राजस्व रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का संकेत है।
प्रशासन पर उठते सवाल
इस पूरे मामले ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं—
- क्या नामांतरण प्रक्रिया अब रिश्वत पर निर्भर हो चुकी है?
- क्या लेखपाल मनमाने ढंग से रिपोर्ट बदल सकते हैं?
- क्या गरीब/आम आदमी बिना पैसा दिए न्याय नहीं पा सकता?
- क्या न्यायालय में भेजी जाने वाली रिपोर्ट भी “मैनेज” हो रही है?
प्रार्थी की मांग
प्रार्थी ने जिलाधिकारी व उच्च अधिकारियों से मांग की है-
✔️ संबंधित लेखपाल पर तत्काल विभागीय व दंडात्मक कार्रवाई
✔️ पूरे मामले की निष्पक्ष जांच
✔️ न्यायालय में सही व निष्पक्ष रिपोर्ट प्रेषित कराई जाए
✔️ दोषी पाए जाने पर भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज हो
राष्ट्रीय महत्व क्यों?
यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक ज़मीन का नहीं है, बल्कि-
पूरे राजस्व तंत्र की साख, पारदर्शिता और ईमानदारी पर सवाल है।
यदि ऐसे मामलों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो—
- ज़मीन खरीदने वाला हर नागरिक असुरक्षित है
- न्यायालयी प्रक्रिया मज़ाक बनकर रह जाएगी
सोनभद्र से आया यह मामला राजस्व भ्रष्टाचार की वह सच्चाई उजागर करता है,
जिससे देश के लाखों ज़मीन मालिक रोज़ जूझ रहे हैं।
अब देखना यह है कि,
प्रशासन सच के साथ खड़ा होता है या सिस्टम आरोपों को दबा देता है।







