सिलिकॉन–मिनी क्वार्ट्ज बन रहा भविष्य की तकनीक का आधार-प्रो. विभूति राय

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म्योरपुर (सोनभद्र)।
देश में सेमीकंडक्टर, सोलर ऊर्जा और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के तेजी से विस्तार के बीच सिलिकॉन–मिनी क्वार्ट्ज एक बार फिर चर्चा में है। भू-विज्ञान की भाषा में यह क्वार्ट्ज का ही उच्च शुद्धता वाला रूप है, जिसमें सिलिकॉन की मात्रा अत्यधिक और अशुद्धियां न्यूनतम होती हैं। यही कारण है कि इसे भविष्य की तकनीक का आधारभूत खनिज माना जा रहा है।
सिलिकॉन–मिनी क्वार्ट्ज मुख्य रूप से प्राचीन भू-गर्भीय संरचनाओं में पाया जाता है। ढाई से तीन अरब वर्ष पुरानी चट्टानों वाले क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी की संभावना अधिक होती है। यह खनिज सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी से शुद्ध सिलिकॉन निकाला जाता है, जिससे कंप्यूटर चिप, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और सोलर सेल तैयार होते हैं।
ऊर्जा क्षेत्र में भी इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है। भारत सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बड़े स्तर पर सोलर पैनल उत्पादन पर जोर दे रही है। ऐसे में हाई-प्योरिटी क्वार्ट्ज से प्राप्त सिलिकॉन आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती देता है। इसके अलावा ऑप्टिकल फाइबर, वैज्ञानिक उपकरणों के विशेष कांच, सिरेमिक और फेरो-सिलिकॉन जैसे मिश्रधातु निर्माण में भी इसका व्यापक उपयोग है।
भू-वैज्ञानिक दृष्टि से यह खनिज न केवल औद्योगिक, बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखता है। भारत जैसे देश के लिए, जहां अभी तक उच्च शुद्धता वाले क्वार्ट्ज के लिए आयात पर निर्भरता रही है, घरेलू स्रोतों की पहचान और वैज्ञानिक खनन आवश्यक हो गया है। सही तकनीक और पर्यावरणीय संतुलन के साथ यदि इसका दोहन किया जाए तो यह खनिज देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
कुल मिलाकर, सिलिकॉन–मिनी क्वार्ट्ज केवल एक खनिज नहीं, बल्कि आने वाले समय में भारत की तकनीकी और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव है।

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