राज्यमार्ग चौड़ीकरण की आड़ में जमीन पट्टा घोटाले का आरोप, मुआवजे के खेल ने खड़े किए राष्ट्रीय स्तर पर सवाल

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विशेष संवाददाता – अमित मिश्रा 8115577137

सोनभद्र। उत्तर प्रदेश में राज्यमार्ग (स्टेट हाईवे) चौड़ीकरण के नाम पर जमीन पट्टा और मुआवजा घोटाले के गंभीर आरोप सामने आए हैं। मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक तंत्र, ग्राम पंचायत व्यवस्था और भूमि प्रबंधन की पारदर्शिता पर राष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि सरकारी जमीन पर आनन–फानन में पट्टा देकर सड़क निर्माण के दौरान मिलने वाले भारी-भरकम मुआवजे का खेल रचा जा रहा है।

यह पूरा प्रकरण प्रदेश के उस बयान की पृष्ठभूमि में और भी गंभीर हो जाता है, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि “कई ग्राम पंचायतों में सरकारी जमीन बची ही नहीं है।” लसड़ा ग्राम पंचायत का यह मामला उसी कथन को सच साबित करता प्रतीत हो रहा है।

लसड़ा ग्राम पंचायत में करोड़ों की जमीन का पट्टा

आरोपों के अनुसार, कलवारी–खलियारी स्टेट हाईवे पर स्थित लसड़ा ग्राम पंचायत के बैठीगांव मार्ग के सामने, नगर पालिका पंप हाउस के पास स्थित ग्राम पंचायत की आराजी संख्या 230 में आधे दर्जन से अधिक लोगों को पट्टा दे दिया गया। यही भूमि प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण की जद में है।

नियमों के तहत, सड़क निर्माण में अधिग्रहित भूमि के बदले सरकार सर्किल रेट से लगभग 13 गुना मुआवजा देती है। आरोप है कि इसी प्रावधान का दुरुपयोग कर सरकारी जमीन को पहले पट्टे के माध्यम से निजी दिखाया गया, ताकि बाद में करोड़ों रुपये का मुआवजा हासिल किया जा सके।

पात्र गरीबों को नजरअंदाज, अपात्रों को लाभ

ग्रामीणों का कहना है कि जिन लोगों को पट्टा दिया गया, वे न तो भूमिहीन हैं और न ही पात्र श्रेणी में आते हैं। जबकि वास्तविक गरीब और जरूरतमंद परिवार वर्षों से जमीन के लिए आवेदन करते आ रहे हैं। जब गांव के पात्र लोगों को इस कथित पट्टा घोटाले की जानकारी हुई, तो उन्होंने उपजिलाधिकारी सदर कार्यालय में शिकायती प्रार्थना पत्र देकर अपात्रों का पट्टा निरस्त करने की मांग की।

प्रशासनिक बयान भी सवालों के घेरे में

मामले में लेखपाल का कहना है कि उन्हें इस पट्टे की कोई जानकारी नहीं है और यदि अतिक्रमण पाया गया तो उच्च अधिकारियों को सूचित कर कार्रवाई कराई जाएगी। वहीं उपजिलाधिकारी सदर का बयान भी विवादों में है। उनका कहना है कि पट्टा नियमानुसार दिया गया है और किसी को आपत्ति होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए। साथ ही प्रदर्शन करने पर सख्त कार्रवाई और जेल भेजने की चेतावनी भी दी गई।

मुआवजा नीति पर उठे सवाल

किसान संघर्ष मोर्चा व अन्य संगठनों का कहना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो राज्यमार्ग चौड़ीकरण परियोजनाएं विकास से अधिक भ्रष्टाचार का माध्यम बनती चली जाएंगी। सरकारी जमीन को निजी बनाकर मुआवजा लेने का यह कथित खेल न केवल राजस्व को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि गरीबों के अधिकारों का भी हनन कर रहा है।

अब सवाल यह है कि क्या शासन इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराएगा, या फिर यह मामला भी अन्य भूमि घोटालों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर यह मुद्दा जमीन प्रबंधन, पंचायत व्यवस्था और सड़क परियोजनाओं की सच्चाई को उजागर करता नजर आ रहा है।

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