जल-जंगल-जमीन पर टकराव: सोनभद्र कलेक्ट्रेट में आदिवासी जनआक्रोश, बड़े आंदोलन की चेतावनी

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अमित मिश्रा

सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)। सोनभद्र जनपद में आदिवासी समाज के जल, जंगल, जमीन और विस्थापन के मुद्दे को लेकर बुधवार को प्रशासनिक अमले के सामने जबरदस्त जनाक्रोश देखने को मिला। बड़ादेव सेवा समिति ट्रस्ट और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के संयुक्त आह्वान पर सैकड़ों आदिवासी महिला-पुरुषों ने सोनभद्र कलेक्ट्रेट परिसर पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी से पूरा परिसर गूंज उठा और प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर गंभीर आरोप लगाए गए।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ग्राम सभा की अनुमति के बिना आदिवासी बहुल इलाकों में ऊर्जा, खनन और औद्योगिक प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकारी जमीन के नाम पर आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन छीनी जा रही है और सोनभद्र को “पावर हब” बनाने की आड़ में वर्षों से आदिवासी समाज को योजनाबद्ध तरीके से विस्थापित किया जा रहा है। इस कारण जंगल उजड़ रहे हैं और हजारों आदिवासी परिवार अपने गांव-घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

कलेक्ट्रेट परिसर उस वक्त आदिवासी जनाक्रोश का प्रतीक बन गया जब नगवां, दुद्धी और म्योरपुर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों से आए लोग एकजुट होकर अपने संवैधानिक अधिकारों की आवाज बुलंद करने लगे। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि जिस जमीन को सरकारी बताया जा रहा है, वह वास्तव में आदिवासियों की है और उस पर उनका पीढ़ियों पुराना अधिकार है, जिसे छीना नहीं जा सकता।

इस आंदोलन में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। महिलाओं ने कहा कि विस्थापन का सबसे बड़ा असर आदिवासी परिवारों, महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है, जिससे उनकी आजीविका, शिक्षा और संस्कृति पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।

प्रदर्शन के बाद प्रतिनिधिमंडल ने सोनभद्र जिलाधिकारी कार्यालय में ज्ञापन सौंपते हुए वनाधिकार अधिनियम के तहत लंबित दावों के निस्तारण, पांचवीं अनुसूची के प्रभावी क्रियान्वयन, ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी भी परियोजना पर रोक और गैर-आदिवासियों के कब्जे से आदिवासियों की जमीन वापस दिलाने की मांग रखी।

मौके पर मौजूद अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) ने प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि जिला स्तर से संबंधित मांगों पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी, जबकि शेष मांगों को शासन स्तर पर भेजा जाएगा। हालांकि प्रदर्शनकारियों ने दो टूक चेतावनी दी कि यदि मांगों पर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को जिले से बाहर तक फैलाया जाएगा।

यह प्रदर्शन अब केवल स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकार, संवैधानिक संरक्षण और विकास बनाम विस्थापन के सवाल पर उभरती एक बड़ी राजनीतिक-सामाजिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

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