चौराहे पर भीख में मांगता बचपन, प्रशासनिक संवेदनहीनता उजागर

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अभिषेक अग्रहरी

O- औद्योगिक नगर ओबरा में मंदिर के सामने मासूमों की कतार, सरकारी दावों पर सवाल

ओबरा (सोनभद्र)। औद्योगिक विकास की पहचान रखने वाला ओबरा नगर इन दिनों एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है, जो समाज और प्रशासन—दोनों के लिए शर्मनाक सवाल खड़े करती है। नगर के मुख्य चौराहे पर स्थित हनुमान मंदिर के सामने रोजाना 3 से 13 वर्ष की आयु के करीब 20 से 25 मासूम बच्चे भीख मांगते नजर आते हैं। आस्था के इस केंद्र पर जहां श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, वहीं बाहर बैठे ये बच्चे अपने बचपन की कीमत चंद सिक्कों और प्रसाद में चुकाने को मजबूर हैं।

स्थानीय पड़ताल में सामने आया है कि ये सभी बच्चे नगर के भलुआ टोला क्षेत्र के निवासी हैं। अत्यंत गरीब पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले इन बच्चों में कई ऐसे हैं जिनके माता-पिता नहीं रहे, जबकि कुछ के अभिभावक कबाड़ बीनकर या अस्थायी मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक उपेक्षा ने इन मासूमों को स्कूल की दहलीज तक पहुंचने से पहले ही सड़क पर ला खड़ा किया है।

विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को, जब मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ अधिक होती है, ये बच्चे प्रसाद और दान की उम्मीद में कतारों और मंदिर परिसर के आसपास मंडराते दिखाई देते हैं। अन्य दिनों में यही बच्चे पूरे नगर में घूम-घूमकर भिक्षावृत्ति करते हैं। यह दृश्य न केवल मानवीय संवेदना को झकझोरता है, बल्कि बाल अधिकारों पर भी सीधा प्रहार करता है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह स्थिति नगर के सबसे व्यस्त और प्रमुख चौराहे की है, जहां से प्रतिदिन प्रशासनिक और परियोजना से जुड़े उच्च अधिकारियों का आवागमन होता है। इसके बावजूद इन बच्चों की बदहाली पर न तो कोई ठोस कदम उठाया गया और न ही उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने की पहल नजर आई। सोनभद्र जैसे अति पिछड़े और आदिवासी बहुल जिले में, जहां बाल कल्याण और गरीबी उन्मूलन को लेकर विशेष योजनाओं के दावे किए जाते हैं, वहां यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है।

नगर के प्रबुद्ध नागरिकों और आम लोगों में इस दृश्य को लेकर गहरी चिंता है। लोगों का कहना है कि यदि मुख्य चौराहे पर बचपन भीख मांगने को मजबूर है, तो विकास और सामाजिक न्याय के दावे केवल कागजों तक ही सीमित हैं। संविधान और कानून द्वारा बाल अधिकारों की सुरक्षा के बावजूद ओबरा में यह हकीकत व्यवस्था को आईना दिखाने के लिए काफी है।

यह मामला केवल कुछ बच्चों की दयनीय स्थिति का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की संवेदनशीलता और जवाबदेही का है। सवाल यह है कि क्या इन मासूमों का भविष्य यूं ही सड़क पर बीतता रहेगा, या प्रशासन जागकर इन्हें शिक्षा, संरक्षण और सम्मानजनक जीवन से जोड़ने की पहल करेगा।

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