गणेश चतुर्थी आज: क्यों हर वर्ष स्थापित की जाती है नई गणेश प्रतिमा? जानिए शास्त्र सम्मत पूजा और विसर्जन की विधि

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सुशील त्रिपाठी

सोनभद्र (उत्तरप्रदेश) । गणेश चतुर्थी सनातन धर्म का प्रमुख पर्व है। भगवान गणेश को सुखकर्ता, विघ्नहर्ता और सिद्धि-बुद्धि के दाता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दौरान पृथ्वी पर गणेशतत्त्व की सक्रियता सामान्य दिनों की तुलना में अधिक रहती है। ऐसे में श्रद्धा और विधिपूर्वक की गई गणेश उपासना को विशेष फलदायी माना जाता है।

गणेश चतुर्थी के व्रत को ‘सिद्धिविनायक व्रत’ भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान गणेश की स्थापना कर विधिवत पूजा-अर्चना, आरती और मंत्रपुष्प किया जाता है।

हर वर्ष नई गणेश प्रतिमा स्थापित करने की मान्यता

धार्मिक परंपरा में गणेश चतुर्थी के लिए प्रत्येक वर्ष नई गणेश प्रतिमा स्थापित करने की बात कही गई है। मान्यता के अनुसार, चतुर्थी के दौरान गणेशतत्त्व से संबंधित ऊर्जा अत्यधिक सक्रिय रहती है। इसलिए इस अवसर पर स्थापित प्रतिमा का उत्सव के बाद विसर्जन किया जाता है।

परंपरागत रूप से गणेश प्रतिमा चिकनी मिट्टी की, लगभग एक से डेढ़ फुट ऊंची, पीढ़े पर विराजमान और बाईं ओर सूंड वाली रखने की मान्यता है। प्राकृतिक रंगों से सजी प्रतिमा को प्राथमिकता दी जाती है। प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं के स्थान पर मिट्टी की प्रतिमा को धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहतर विकल्प माना जाता है।

कितने दिन विराजते हैं गणपति?

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश प्रतिमा की स्थापना और प्राणप्रतिष्ठा की परंपरा है। धार्मिक विधि में उसी दिन विसर्जन का उल्लेख मिलता है, जबकि लोक परंपरा में गणपति को डेढ़, तीन, पांच, सात अथवा दस दिनों तक विराजमान रखने की परंपरा भी प्रचलित है।

कई परिवारों में वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार विसर्जन का दिन निर्धारित किया जाता है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और मान्यता के अनुसार गणपति विसर्जन करते हैं।

कैसे करें गणेश प्रतिमा की स्थापना?

गणेश प्रतिमा की स्थापना के लिए पूजा की चौकी पर अक्षत रखकर उसके ऊपर प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल पंचोपचार पूजा, आरती और मंत्रपुष्प करने की परंपरा है।

प्रतिमा की दिशा को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं हैं। परंपरा में गणेश प्रतिमा का मुख पश्चिम दिशा की ओर रखने को श्रेष्ठ माना गया है। दक्षिण दिशा की ओर प्रतिमा का मुख रखने से बचने की सलाह दी जाती है।

गणपति को घर लाने की भी है विशेष परंपरा

गणेश प्रतिमा को घर लाते समय श्रद्धालु ‘गणपति बाप्पा मोरया’ का जयघोष और नामजप करते हैं। प्रतिमा को स्वच्छ वस्त्र से ढककर सम्मानपूर्वक घर लाने की परंपरा है। घर में प्रवेश से पहले आरती कर प्रतिमा को पूजा स्थल तक ले जाया जाता है और निर्धारित स्थान पर स्थापित किया जाता है।

विसर्जन से पहले होती है उत्तरपूजा

गणेश प्रतिमा के विसर्जन से पहले उत्तरपूजा की जाती है। इसमें चंदन, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद आरती और मंत्रपुष्पांजलि कर भगवान गणेश को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।

विसर्जन स्थल पर भी आरती और श्रद्धापूर्वक पूजा के बाद गणेश प्रतिमा का जल में विसर्जन किया जाता है। धार्मिक परंपरा में दही, पोहे, नारियल और मोदक आदि अर्पित करने का भी उल्लेख मिलता है।

गणेश चतुर्थी केवल उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धा, उपासना और आत्मिक साधना का अवसर है। भगवान गणेश से भक्त अपने जीवन के विघ्न दूर करने, सुख-समृद्धि और सिद्धि-बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं।

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