अमित मिश्रा
O- प्रदर्शनकारियों का आरोप, पेड़ों की कटान से जुड़े मुख्यमंत्री के निर्देशों की अनदेखी हो रही है।
O- वन विभाग की प्रक्रिया पर उठाए सवाल, सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग।
सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)। सोनभद्र में प्रस्तावित निजी पावर परियोजनाओं के लिए वन भूमि चयन को लेकर आदिवासी समाज का विरोध तेज हो गया है। मंगलवार को किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के नेतृत्व में सैकड़ों आदिवासी पुरुष और महिलाएं कलेक्ट्रेट पहुंचे और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जिन क्षेत्रों को परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया जा रहा है, वहां घने जंगल और बड़ी संख्या में बहुमूल्य पेड़ मौजूद हैं, जिससे व्यापक स्तर पर पर्यावरणीय नुकसान और आदिवासी समुदाय की आजीविका पर संकट खड़ा हो सकता है।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मुख्यमंत्री ने पहले निर्देश दिए थे कि विकास परियोजनाओं के लिए ऐसी भूमि का चयन किया जाए जहां पेड़ों की कटान न्यूनतम हो या बिल्कुल न करनी पड़े। उनका आरोप है कि इसके बावजूद वन विभाग द्वारा जारी पत्र के आधार पर ऐसे क्षेत्रों में भूमि चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, जहां प्राकृतिक वन क्षेत्र सुरक्षित हैं। उन्होंने सरकार से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वन भूमि चयन की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
आंदोलन में बड़ी संख्या में शामिल आदिवासी महिलाओं ने कहा कि जंगल उनके लिए केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और आजीविका का आधार हैं। महुआ, तेंदूपत्ता, साल, पलाश सहित विभिन्न वन उत्पादों पर हजारों परिवारों की आजीविका निर्भर है। उनका कहना है कि यदि बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित हुए तो इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आदिवासी समाज की सामाजिक और आर्थिक संरचना भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी।
किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने कहा कि विकास के नाम पर जंगलों का विनाश स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने मांग की कि सरकार स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासी समुदाय की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को आगे न बढ़ाए तथा पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराए।
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर समय रहते सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो आंदोलन को पूरे प्रदेश में विस्तार दिया जाएगा। फिलहाल इस मुद्दे ने विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजर मुख्यमंत्री कार्यालय और वन विभाग के अगले कदम पर टिकी है।






