अभिषेक अग्रहरी
O- ₹4.93 करोड़ की ‘मुख्यमंत्री सौगात’ पर सवाल
O- डाला–ओबरा मार्ग पर घटिया निर्माण की आशंका, क्या जिम्मेदारों पर गिरेगी गाज?
ओबरा (सोनभद्र) । जनता की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सुविधा के नाम पर स्वीकृत ₹4 करोड़ 93 लाख की भारी-भरकम धनराशि आखिर किसके हित में खर्च हो रही है? डाला–ओबरा मुख्य संपर्क मार्ग पर चल रहा निर्माण कार्य अब विकास नहीं, संभावित अपराध के कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। सवाल सीधे-सीधे मुख्यमंत्री की मंशा, सरकारी धन की ईमानदारी और प्रशासनिक निगरानी पर उठ रहे हैं।
डाला–ओबरा मार्ग वर्षों से बदहाली का दंश झेल रहा था—बरसात में कीचड़, गर्मी में धूल के गुबार और हर मौसम में जानलेवा गड्ढे। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री द्वारा इस मार्ग की विशेष मरम्मत को विकास सौगात के रूप में स्वीकृति दी गई। उद्देश्य साफ था, सुरक्षित आवागमन, जनस्वास्थ्य की रक्षा और स्थायी समाधान।
लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता से खुला समझौता किया जा रहा है। मानकों की अनदेखी, सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल और भारी वाहनों के दबाव को झेलने में अक्षम दिखता निर्माण ये सब संकेत किसी सामान्य लापरवाही के नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका को जन्म देते हैं।
गौरतलब है कि यह मार्ग शक्तिनगर–वाराणसी स्टेट हाईवे से जुड़ा हुआ है और खनन व क्रशर बेल्ट से होकर गुजरता है, जहां रोज़ाना सैकड़ों ट्रक और डंपर दौड़ते हैं। ऐसे में यदि सड़क निर्माण मानकों के अनुरूप नहीं हुआ, तो यह सिर्फ गड्ढों की वापसी नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण होगा, जिसकी जिम्मेदारी तय करना फिर मुश्किल हो जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि-
O- क्या लोक निर्माण विभाग की निगरानी कागज़ों तक सीमित है?
O- क्या करोड़ों की लागत केवल फाइलों में मजबूत है, सड़क पर नहीं?
O- अगर कल कोई बड़ा हादसा हुआ, तो जिम्मेदार कौन होगा?
यह रिपोर्ट किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, बल्कि प्रशासन को आईना दिखाने की कोशिश है। मुख्यमंत्री की सौगात को यदि ज़मीनी स्तर पर घटिया निर्माण की भेंट चढ़ा दिया गया, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता के साथ अपराध माना जाएगा।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
क्या इस निर्माण की निष्पक्ष तकनीकी जांच होगी?
क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला धूल में दबा दिया जाएगा?
जनता जवाब चाहती है, और अब चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।







