अनोखी परम्परा: पांच दिन पूर्व मनाया गया वनवासी समाज ने होली

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वीरेन्द्र कुमार

शनिवार को जलाया होलिका , रविवार को खेली धूमधाम से होली

विंढमगंज(सोनभद्र/ उत्तर प्रदेश)। भारत ही एक देश है जहां अनेक सभ्यता एवं संस्कृति के लोग रहते हैं। इसमें विविधताओं के असंख्य स्वरूप हैं। उसके अपने मायने हैं। अपनी विशेषता है और खूबसूरती है। इसीलिए तो जनपद के आदिवासी बाहुल्य विंढमगंज थाना क्षेत्र के झारखंड व छत्तीसगढ़ के बॉर्डर पर स्थित बैरखड़़ गांव है जहां पर होली मनाने की अलग और अति प्राचीन परंपरा है। इसके वर्तमान स्वरूप में अत्यंत प्राचीन काल की संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है।


प्रायः ऐसी मान्यता है कि बैरखड़ गांव के आदिवासी 5 दिन पहले यानी बीती शनिवार की रात्रि को होलिका दहन तथा आज रविवार को होली का त्योहार आदिवासी परम्परा के अनुसार मना रहे हैं। होली मनाने की परम्परा को लेकर निर्वतमान ग्राम प्रधान उदय पाल कहते हैं कि गांव में और जगह की अपेक्षा 5 दिन पूर्व ही होली मनाने की परम्परा काफी पुरानी है ।गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले दादा, परदादा के जमाने में गांव में होली पर्व के दौरान ही भारी धन जन की क्षति हुई थी और गांव में महामारी जैसी स्थिति हो गई थी।गांव के लोग काफी परेशान थे तब उसका निदान ढूंढने के लिए आदिवासी समुदाय के बुजुर्ग लोगो एवं बैगा ने चार – पांच दिन पहले होली मनाने का सुझाव दिया था तभी से बैरखड़ गांव में 5 दिन पूर्व होली मनाने की परंपरा चल पड़ी जिसे आदिवासी समाज आज भी संजोए हुए हैं।गांव के लोग बताते हैं कि अब गांव में सुख समृद्धि बनी रहती हैं।

नियत तिथि पर नहीं मनाते होली- बैरखड़ के निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल , पूर्व प्रधान अमर सिंह गौड़, मनरूप गहंवां,छोटेलाल सिंह ,रामकिशुन सिंह,लाल मोहन गोंड कहते है कि हमारे पूर्वज ने हमें बताया है कि किसी समय होली के दिन सभी आदिवासी लोग नशे में आनंदित थे। सभी लोग नाच-गा रहे थे, तभी किसी अनहोनी घटना में कई लोग एक साथ मर गए थे तब आदिवासी बैगा ने होली मनाने की परंपरा नियत तिथि से पूर्व मनाने की सलाह दी।उसके बाद से गांव में 5 दिन पहले होली मनाई जाने लगी और गांव सुख शांति और अमन चैन कायम हो गई तब से ही गांव में होली मनाने की परंपरा हो चली जो अब तक जारी है।उन्होंने बताया कि होलिका दहन बैगा या अपनी ही बिरादरी के मनोनीत बैगा लोगों से कराने की प्रथा है।

होली गीत गाते आदिवासी समाज के लोग

इस स्थल को संवत डाड़ कहा जाता है जहां होलिका दहन के अगले दिन यानि आज रविवार को होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा पाठ किया जाता है।

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