30 लाख का अस्पताल, इलाज शून्य

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अभिषेक अग्रहरी

O- ओबरा में उद्घाटन के बाद भी निष्क्रिय राजकीय होम्योपैथिक अस्पताल ने उजागर की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत

ओबरा (सोनभद्र)। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत ओबरा नगर क्षेत्र में साफ देखी जा सकती है। विकासखंड चोपन अंतर्गत ग्राम बिल्ली मारकुंडी के खैरटिया टोला में निर्मित राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय, ओबरा आज एक ऐसे सरकारी ढांचे का उदाहरण बन चुका है, जो कागज़ों में पूर्ण और धरातल पर निष्क्रिय है।

प्रदेश सरकार द्वारा लगभग 30 लाख रुपये की लागत से इस अस्पताल भवन का निर्माण कराया गया। 15 नवंबर 2025 को मुख्यमंत्री के चोपन आगमन के दौरान इसका विधिवत उद्घाटन भी किया गया। उद्देश्य स्पष्ट था, ग्रामीण, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को कम लागत, सुरक्षित और दीर्घकालिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना। लेकिन उद्घाटन के कई महीने बाद भी यह अस्पताल अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में असफल दिखाई दे रहा है।

भवन खड़ा, लेकिन बुनियादी सुविधाएं नदारद

स्थानीय लोगों के अनुसार अस्पताल भवन में कमरे, दरवाजे, खिड़कियां, पंखे और लाइटें तो लगाई गई हैं, लेकिन स्थायी बिजली कनेक्शन अब तक उपलब्ध नहीं है। शौचालयों का निर्माण किया गया है, परंतु बोरिंग या नियमित जलापूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। उद्घाटन के दिन अस्थायी रूप से पानी की टंकी भरकर औपचारिकता निभाई गई, जो बाद में पूरी तरह समाप्त हो गई।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली और पानी के बिना किसी भी अस्पताल का संचालन संभव नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या विभाग ने अस्पताल को शुरू करने से पहले न्यूनतम आवश्यकताओं का भी आकलन किया था?

जर्जर सड़क बनी इलाज की राह में बाधा

अस्पताल तक पहुंचने वाला मुख्य मार्ग अत्यंत जर्जर हालत में है। बरसात के दिनों में यह रास्ता कीचड़ और गड्ढों में तब्दील हो जाता है। बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए यहां तक पहुंचना जोखिम भरा साबित हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक सड़क दुरुस्त नहीं होगी, तब तक अस्पताल केवल नाम का ही रह जाएगा।

डॉक्टर और स्टाफ की स्थिति अस्पष्ट

अस्पताल में डॉक्टरों की नियमित नियुक्ति और कार्य-समय को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कभी-कभार डॉक्टर आते हैं, लेकिन कोई निश्चित समय-सारिणी नहीं है। कंपाउंडर और सहायक स्टाफ की तैनाती भी प्रभावी रूप से नजर नहीं आती। दवाओं की उपलब्धता को लेकर भी कोई स्थायी व्यवस्था सामने नहीं आई है।

परिणामस्वरूप यह अस्पताल ग्रामीणों के लिए इलाज का केंद्र बनने के बजाय प्रशासनिक औपचारिकता और फोटो सेशन की याद बनकर रह गया है।

ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा की जरूरत सबसे अधिक

जिस क्षेत्र में यह अस्पताल बना है, वहां बड़ी संख्या में ग्रामीण, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार रहते हैं। यहां एलर्जी, त्वचा रोग, श्वसन संबंधी समस्याएं और बच्चों की सामान्य बीमारियां आम हैं, जिनमें होम्योपैथिक चिकित्सा प्रभावी मानी जाती है। ऐसे क्षेत्र में अस्पताल का निष्क्रिय होना सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जनता के सवाल, प्रशासन मौन

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार का उद्देश्य केवल भवन बनाना नहीं, बल्कि निरंतर और भरोसेमंद स्वास्थ्य सेवा देना होना चाहिए। यदि बिजली, पानी, सड़क, डॉक्टर और दवाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं, तो लाखों रुपये खर्च कर बनाया गया यह भवन जनता के किसी काम का नहीं।

अब सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस अस्पताल को वास्तव में चालू करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा?
या फिर यह अस्पताल भी प्रदेश के उन सैकड़ों सरकारी ढांचों में शामिल हो जाएगा, जो केवल उद्घाटन की तारीख तक ही जीवित रहते हैं?

ओबरा का राजकीय होम्योपैथिक अस्पताल आज केवल एक इमारत नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस परीक्षा में सफल होता है या नहीं।

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