संतोष सोनी
यूपी में जातीय जोड़तोड़ से गरमाई सियासत, BJP के सामने पीडीए और बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की दोहरी चुनौती
लखनऊ । उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिगत समीकरण किस कदर हावी हैं, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में सत्ता हर बार जातीय गणित के दम पर बदलती रही। यही वजह है कि 2027 की तैयारियों में भाजपा, सपा और बसपा तीनों ने जातीय रणनीतियों को अपना चुनावी केंद्र बना लिया है।
ठाकुर, कुर्मी और लोध समाज की हलचल
लखनऊ में ठाकुर नेताओं ने “कुटुंब परिवार” नाम से बैठक कर अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया। महाराणा प्रताप की तस्वीरों और त्रिशूल वितरण के जरिए एकजुटता का संदेश दिया गया। इसके बाद कुर्मी विधायकों ने “सरदार पटेल वैचारिक मंच” के तहत अलग पहचान दर्ज कराई। उधर बरेली और दिल्ली में लोध समाज की सभाओं ने भी राजनीतिक संदेश दिया, जिनमें उमा भारती जैसे बड़े नेता मौजूद रहे।

पासी समाज और ब्राह्मणों की सक्रियता
लखनऊ में पासी समाज ने महासम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और सांसद दिनेश शर्मा ने हिस्सा लिया। फरवरी में रमाबाई मैदान में विशाल रैली का ऐलान भी किया गया। वहीं ब्राह्मण प्रतिनिधियों ने राजधानी के गेस्टहाउस में बैठक कर शासन में उपेक्षा और एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग की शिकायतें रखीं। मंत्री ने परशुराम की प्रतिमा और शॉल भेंट कर संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा ब्राह्मण समाज को नाराज़ नहीं होने देना चाहती।
विपक्ष का पीडीए और चौपाल रणनीति
इसी बीच समाजवादी पार्टी ने दिल्ली में “गुर्जर चौपाल” का आयोजन कर छोटे समुदायों को साधने की नई पहल शुरू की। अखिलेश यादव ने यहां संदेश दिया कि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठजोड़ ही भाजपा का असली विकल्प होगा। इसके तहत पश्चिमी यूपी के 34 जिलों में चौपाल और रैलियों का खाका खींचा गया है।
मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की तैयारी
बसपा सुप्रीमो मायावती भी पीछे नहीं हैं। हाल ही में कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने चुनावी रणनीति पर चर्चा की। माना जा रहा है कि वे एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले को सामने ला सकती हैं। 2007 की तर्ज पर जब उनका नारा “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है” गूंजा था और दलित-ब्राह्मण गठजोड़ से पार्टी सत्ता तक पहुंची थी, वैसा ही प्रयोग दोहराने की तैयारी दिख रही है।
2012 का सपा अनुभव
जातीय संतुलन का फायदा समाजवादी पार्टी को 2012 में मिला। उस चुनाव में सपा को जाटव वोट में 11%, ब्राह्मण वोट में 9% और राजपूत व ओबीसी वोट में 6-6% की अतिरिक्त लीड हासिल हुई। कुल 29.2% वोट शेयर के साथ सपा ने 403 में से 224 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। यह साफ करता है कि यूपी में जातीय समीकरणों की जुगलबंदी किस हद तक निर्णायक साबित होती है।
2017 में भाजपा का जातीय प्रयोग
2017 में भाजपा ने जातीय समीकरणों का नया गणित लिखा। सीएसडीएस के आंकड़ों के मुताबिक, 10% यादव, 61% अन्य ओबीसी, 9% जाटव, 31% अन्य दलित और 6% मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया। यह वही वर्ग थे जो पहले भाजपा से दूर रहते थे। नतीजतन भाजपा ने रिकॉर्ड बहुमत हासिल किया।
बसपा का 2007 और उसका पतन
इससे पहले 2007 में बसपा ने 86% जाटव, 71% बाल्मीकि, 53% पासी और 58% अन्य दलित जातियों के समर्थन से सरकार बनाई थी। लेकिन 2012 आते-आते जाटव समर्थन में 24%, बाल्मीकि में 29% और अन्य दलित जातियों में 13% की गिरावट आई, जिससे बसपा सत्ता से बाहर हो गई।
बदलता जातीय गणित
विशेषज्ञों का मानना है कि 90 के दशक तक यूपी की राजनीति बड़े वर्गों – ओबीसी, दलित, मुस्लिम और सवर्ण – पर आधारित थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। छोटे समुदाय जैसे राजभर, निषाद, कुर्मी, पासी और गुर्जर अपनी अलग पहचान और सौदेबाजी की ताक़त बन गए हैं। यही वजह है कि भाजपा को हिंदुत्व की छतरी से आगे बढ़कर जातीय संतुलन साधना पड़ रहा है।
भाजपा की चुनौती और 2027 का रोडमैप
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को ओबीसी समर्थन कमजोर होता दिखा था। सपा का पीडीए फार्मूला और कांग्रेस का आरक्षण एजेंडा उसके वोट बैंक में सेंध लगाते दिखे। यही कारण है कि भाजपा अब कल्याण सिंह की विरासत और “हिंदू गौरव दिवस” जैसे आयोजनों से अपने पुराने समर्थकों को साधने की कोशिश कर रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि 2027 तक जातीय राजनीति और तेज़ होगी। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह सिर्फ “हिंदू पार्टी” की छवि से आगे निकलकर हर वर्ग की प्रतिनिधि पार्टी बन सके। वहीं सपा अपने पीडीए, बसपा सोशल इंजीनियरिंग और कांग्रेस आरक्षण की राजनीति के दम पर सत्ता की जंग लड़ने के लिए तैयार हो रही हैं।







