ओबी बर्डेन से रहवासियों को खतरा, बचाव कार्य कराये जाने की उठी मांग

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अमित मिश्रा

ऊर्जांचल विस्थापित कल्याण समिति ने उठाया मुद्दा

सोनभद्र(उत्तर प्रदेश)।  जनपद में ऊर्जांचल विस्थापित कल्याण समिति के जिला अध्यक्ष हेमंत मिश्रा ने बताया कि प्रमुख सचिव सहित कई विभागों को पत्र भेज कर शक्तिनगर क्षेत्र में स्थित नॉर्दर्न कोलफील्ड लिमिटेड (एनसीएल) खड़िया परियोजना का ओवर बर्डेन (ओबी) एनटीपीसी पूर्नवास गांव चिल्काडॉड के 12 हजार निवासरत लोगों पर मौत का साया बना मंडरा रहा है।

चिल्काडॉड़ को एनटीपीसी सिंगरौली परियोजना द्वारा 1976-77 में विस्थापित कर बसाया गया था, तब एनसीएल खड़िया परियोजना और रेलवे स्टेशन कही भी अस्तित्व में नहीं था।1980-81 में एनसीएल खड़िया परियोजना के अस्तित्व में आने के बाद ओपन कास्ट कोल माइंस का विस्तार होने से चिल्काडॉइ गांव से सटा 200-300 मीटर के दूरी पर, 300 मीटर ऊंचा रेतीला कृत्रिम पहाड़ बना कर एनसीएल द्वारा ओबी डंप किया जानें लगा। अब यह ओबी उपरोक्त क्षेत्र के लोगों लिए जान पर आफत बन गया है।

बरसात के मौसम में कई हादसे हो चुके है रेतीले पहाड़ हादसे की बात करें तो यहां पर 2008 से लेकर 2021 तक दर्जनों हादसे हो चुके हैं जिसमें कई लोगों की जाने जा चूंकि हैं फिर भी जिला प्रशासन कोई सकारात्मक कदम नहीं उठा पा रहा है। प्रतिदिन दोपहर में होने वाले मानक से विपरीत हैवी ब्लास्टिंग से घरों के दरवाजा, खिड़की, बर्तन खन-खना जाते हैं, लगता है जैसे भूकंप आया हो । गांव के लगभग सभी कच्चे पक्के मकान एवं बोरवेल क्षतिग्रस्त हो गए हैं। यहां चौबीस घंटे बड़ी-बड़ी हैवी वाहनों के चलने एवं ओबी डंप से धुआं, धूल के गुब्बार से ढका रहता है नतीजा यह है कि छोटे-छोटे बच्चे, बूढ़े, जवान दमा, खासी, धर्म रोग, हृदय एवं विभिन्न प्रकार के गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है।


वर्तमान में चिल्काडोंड गांव से सटा ओबी पहाड़ पर एनसीएल के संविदा कंपनियों ‌द्वारा अपने पैसे बचाने के चक्कर में मनमानी तरीके से गांव के समीप ओबी डंप कर पहाड़ कि ऊंचाई अगातार बढ़ाते जा रहे है जो कि नियम विरुद्ध है। ओबी की चपेट में दर्जनों गांव के हजारों लोग हैं और यह कोई अतिक्रमणकारी नहीं है, यह या तो किसी परियोजना ‌द्वारा बसाऐ गए लोग हैं या निजी पट्टे की भूमी पर निवासरत लोग।


एनजीटी की कोर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ओवर बर्डेन के समुचित इस्तेमाल के लिए खाली पड़ी खदानों में ओबी और फ्लाई ऐश पाटने के सुझाव दिए थे। जिस पर एनजीटी ने एनसीएल प्रबंधन को निर्देश भी जारी किया था। इस के पीछे मकसद यह था कि खाली पड़ी खदानों को पाट देने के बाद उसे पर सघन पौधारोपण कराया जाए और आगे चलकर उस जमीन का उपयोग किया जा सके। इसके दो फायदे थे, पहला ओबी के पहाड़ खड़े नहीं होंगे दुसरा फ्लाई ऐश का समुचित उपयोग किया जा सकता है। यहां ऐसा नहीं हुआ प्राइवेट कंपनियों के हाथों में ओबी की कमान है जो अपने मुनाफे के लिए जहां चाहे, वहां डंप कर दे रहे हैं ओबी। इसमें सर्वे डिपार्टमेंट की भी भूमिका संदिग्ध है। इन पर न कोई लगाम है और ना ही जिम्मेदारी। चंद पैसों के लालच में हजारों लोगों की जान पर दाव लगाई जा रही है।


उपरोक्त गांव में 2012 में हुये हादसे में तत्कालीन जिला अधिकारी द्वारा उप जिलाधिकारी दुद्धी एवं पुलिस उपाधीक्षक पिपरी से संयुक्त रूप से जांच करा कर एक आदेश जारी किया था जिसमें एनसीएल और एनटीपीसी को संयुक्त रूप से चिल्काडॉड़ गांव को हटाकर कहीं अन्यत्र सुरक्षित जगह स्थापित करने का निर्देश दिया था। 

इस पत्र के साथ संलग्न है पर दुर्भाग्य है ऐसा नहीं हुआ, इसका नतीजा यह है की लोग हादसा और बीमारियों के कारण असमय काल के गाल में समा रहे हैं जिसके संबंध में उचित जांच करा कर स्थानीय एनसीएल व एनटीपीसी प्रबंधन को उपरोक्त गांव वासियों को डेंजर जोन से हटाकर सुरक्षित स्थान पर विस्थापित कराये जाने की कृपा की जाय।

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