राज्यमार्ग चौड़ीकरण की आड़ में जमीन पट्टा–मुआवजा घोटाल

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ब्यूरो चीफ – अमित मिश्रा

O- वेतन रोकने से लेकर रिपोर्ट तक, कार्रवाई के घेरे में अधिकारी, तीखे बयानों से गरमाई सियासत

सोनभद्र। उत्तर प्रदेश में राज्यमार्ग (स्टेट हाईवे) चौड़ीकरण की आड़ में सामने आए जमीन पट्टा, मुआवजा और पद के दुरुपयोग के गंभीर मामले ने अब प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और. सामाजिक स्तर पर भी तीखा रूप ले लिया है।
सोनभद्र जिले के लसड़ा ग्राम पंचायत से शुरू हुआ यह प्रकरण अब भ्रष्टाचार, घोटालेबाज़ी और प्रशासनिक मिलीभगत के आरोपों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

यह पूरा मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान की पृष्ठभूमि में और भी गंभीर हो जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था-
“कई ग्राम पंचायतों में सरकारी जमीन बची ही नहीं है।”
लसड़ा ग्राम पंचायत का घटनाक्रम इस कथन को ज़मीन पर सच साबित करता नजर आ रहा है।

पहली कड़ी: करोड़ों की सरकारी जमीन का पट्टा

प्रारंभिक खबर में खुलासा हुआ था कि कलवारी–खलियारी स्टेट हाईवे पर स्थित लसड़ा ग्राम पंचायत में, बैठीगांव मार्ग के सामने नगर पालिका पंप हाउस के पास स्थित आराजी संख्या 230 की सरकारी भूमि पर चार व्यक्तियों को छः विस्वा पट्टा दे दिया गया।
यह वही भूमि है, जो प्रस्तावित राज्यमार्ग चौड़ीकरण की जद में है और जिसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी जा रही है।

नियमों के अनुसार सड़क निर्माण में अधिग्रहित भूमि पर सरकार द्वारा सर्किल रेट से लगभग 13 गुना मुआवजा दिया जाता है। आरोप है कि इसी प्रावधान का दुरुपयोग कर सरकारी जमीन को पहले निजी दर्शाया गया, ताकि बाद में भारी भरकम मुआवजा प्राप्त किया जा सके।

दूसरी कड़ी: पात्र गरीबों की अनदेखी

ग्रामीणों का आरोप है कि जिन लोगों को पट्टा दिया गया, वे न तो भूमिहीन हैं और न ही पात्र श्रेणी में आते हैं। इसके विपरीत, वास्तविक गरीब और जरूरतमंद परिवार वर्षों से पट्टे के लिए आवेदन करते आ रहे हैं।
जब इस कथित घोटाले की जानकारी सामने आई, तो पीड़ित ग्रामीणों ने उपजिलाधिकारी सदर कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

तीसरी कड़ी: विरोधाभासी रुख और सवाल

पहले उपजिलाधिकारी सदर उत्कर्ष द्विवेदी द्वारा पट्टों को नियमसम्मत बताया गया, लेकिन बाद में उन्हीं की ओर से कार्रवाई की संस्तुति भेजी गई।
इस बदले हुए रुख को लेकर जानकार इसे “चित भी मेरी, पट भी मेरी” वाली स्थिति बता रहे हैं और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

कार्रवाई तेज: वेतन रोका, रिपोर्ट भेजी

मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई का दायरा बढ़ा है-

  • तहसीलदार सदर का वेतन रोककर स्पष्टीकरण तलब किया गया है।
  • तहसीलदार अमित कुमार सिंह का जवाब असंतोषजनक पाए जाने पर उनका भी वेतन रोक दिया गया है।
  • ग्राम प्रधान रूचि पाण्डेय,
    कानूनगो अवधेश तिवारी,
    नायब तहसीलदार मनोज मिश्रा,
    राजस्व निरीक्षक कार्यालय राजेंद्र प्रसाद टंडन,
    तथा उपजिलाधिकारी के स्टेनो अखिलेश मिश्रा के विरुद्ध कार्रवाई के लिए जिलाधिकारी सोनभद्र को विस्तृत रिपोर्ट भेजी गई है।
  • ग्राम प्रधान के विरुद्ध कार्रवाई की संस्तुति करते हुए जिलाधिकारी के साथ-साथ मुख्य विकास अधिकारी को भी पत्र प्रेषित किया गया है।
  • इससे पूर्व हल्का लेखपाल को निलंबित किया जा चुका है।

भाजपा नेता धर्मवीर तिवारी का कड़ा प्रहार

इस पूरे प्रकरण पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व जिलाध्यक्ष धर्मवीर तिवारी ने तीखा बयान देते हुए कहा-

“राज्यमार्ग के नाम पर सरकारी जमीन को लूटने का यह खुला खेल है। गरीबों के हक की जमीन घोटालेबाज़ों में बांटी गई। दोषी चाहे कितने भी बड़े पद पर क्यों न हों, उन पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर असली भ्रष्टाचार को नहीं छिपाया जा सकता।”

उन्होंने मामले की उच्चस्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से पद से हटाने की मांग की।

किसान संघर्ष मोर्चा का ऐलान

किसान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने भी घोटालेबाज़ों पर सीधा हमला बोलते हुए कहा-

“यह सिर्फ पट्टा घोटाला नहीं, बल्कि अन्नदाता और गरीबों के हक पर डाका है। सरकारी कुर्सी पर बैठकर जिन्होंने इस खेल को अंजाम दिया, वे सबसे बड़े अपराधी हैं। अगर जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो किसान संघर्ष मोर्चा सड़क से लेकर शासन तक आंदोलन करेगा।”

उन्होंने उपजिलाधिकारी कार्यालय और उससे जुड़े कर्मियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की।

राष्ट्रीय स्तर पर उठे सवाल

यह मामला अब केवल एक पंचायत या तहसील तक सीमित नहीं रहा। यह कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है-

  • क्या राज्यमार्ग परियोजनाएं विकास नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का माध्यम बनती जा रही हैं?
  • क्या सरकारी जमीन को निजी बनाकर मुआवजा लेने का संगठित तंत्र सक्रिय है?
  • और क्या कार्रवाई केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित रह जाएगी?
  • भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि कानूनगो अवधेश तिवारी  द्वारा पूर्व में भी जमीन विवाद के मामले में कई आरोप प्रत्यारोप लग चुके हैं इसके बावजूद अधिकारियों के करीबी बताए जाते हैं, नहीं होती है इन पर कोई ठोस कार्रवाई, पूरे प्रकरण में एक संदिग्ध दलाल जिसके द्वारा बड़े लोगो को गरीब पात्र बनाकर उनसे लाखों मे मोटी रकम वसूली गई उस पर भी हो करवाई? दलाल भी कानूनगो अवधेश तिवारी का करीबी बताया जाता है।

अब निगाहें शासन और जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि यह मामला उदाहरणात्मक कार्रवाई तक पहुंचेगा, या फिर यह भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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