लखनऊ। राजधानी के अहिमामऊ इलाके स्थित स्वस्तिका सिटी में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह केवल एक कॉलोनी विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता और कानून के समान प्रयोग पर गंभीर सवाल खड़े करता है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि जौनपुर के महाराजगंज ब्लॉक प्रमुख परिवार से जुड़े विनय सिंह ने ईंट की दीवार खड़ी कर सार्वजनिक रास्ता अवरुद्ध कर दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि विरोध करने पर उन्हें धनंजय सिंह का नाम लेकर खुलेआम धमकाया गया। पीड़ितों ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर पुलिस कमिश्नर तक से की, लेकिन कार्रवाई आरोपी पर होने के बजाय शिकायतकर्ताओं पर ही एफआईआर दर्ज कर दी गई।

शिकायतकर्ता ही आरोपी बना दिए गए!
मामले में कौशलेन्द्र तिवारी, धीरेंद्र मणि त्रिपाठी सहित अन्य स्थानीय नागरिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विनय सिंह के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जबकि आरोप गंभीर और सार्वजनिक हित से जुड़े हैं।

शोर बढ़ा तो बदले गए थानेदार
मीडिया और जनदबाव बढ़ने के बाद आखिरकार उपेन्द्र सिंह, प्रभारी निरीक्षक सुशांत गौर सिटी को हटा दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल स्थानांतरण ही जवाबदेही का विकल्प बन गया है?
क्या प्रशासन में ‘डिफॉल्ट SOP’ काम कर रही है?
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासन में एक अघोषित SOP (Standard Operating Procedure) बन चुकी है.
- किन मामलों में तुरंत एक्शन लेना है
- किन मामलों में आंख मूंद लेनी है
- किसे बचाना है और किसे कानूनी शिकंजे में कसना है
लोकतंत्र में भरोसे की परीक्षा
अहिमामऊ का यह मामला अब सिर्फ एक कॉलोनी विवाद नहीं, बल्कि यह प्रशासनिक निष्पक्षता, कानून के राज और आम नागरिक के अधिकारों की परीक्षा बन चुका है। सवाल सीधा है,
क्या रसूखदारों के लिए कानून अलग है और आम नागरिकों के लिए अलग?
यदि इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच और समान कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला राजधानी लखनऊ से निकलकर प्रदेश की सियासी और प्रशासनिक कार्यशैली पर राष्ट्रीय बहस छेड़ सकता है।







