आईआईटी कानपुर के JTRC सम्मेलन में पर्यावरण कार्यकर्ता ने रखा पक्ष, मानवीय मूल्यों की अनदेखी पर जताई चिंता
म्योरपुर, सोनभद्र। देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाले सिंगरौली-सोनभद्र परिक्षेत्र में प्रदूषण, विस्थापन और जनस्वास्थ्य का मुद्दा गोवा के अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया गया।
आईआईटी कानपुर के जस्ट ट्रांजिशन रिसर्च सेंटर (JTRC) के सम्मेलन में पर्यावरण कार्यकर्ता जगत नारायण विश्वकर्मा और आनंद ने कोयला आधारित ऊर्जा उत्पादन के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि मानवीय मूल्यों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी कर सतत विकास संभव नहीं है।
सोनभद्र-सिंगरौली में कोयला खदानों और तापीय विद्युत परियोजनाओं के विस्तार ने ऊर्जा व्यवस्था को मजबूती दी है, लेकिन स्थानीय आबादी के सामने प्रदूषण, पेयजल, आजीविका, भूमि अधिग्रहण और स्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ी हैं।
विस्थापन से आजीविका का संकट भूमि देने वाले आदिवासी-ग्रामीण परिवारों को विकास का वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा। पुनर्वास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को विकास प्रक्रिया का हिस्सा बनाना जरूरी है।
प्रदूषण और स्वास्थ्य पर चिंता – तापीय संयंत्रों की राख, औद्योगिक उत्सर्जन और जलस्रोतों पर प्रभाव से स्वच्छ हवा और पानी बड़ी चुनौती है। नियमित निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत है।
जगत ने कहा कि न्यायपूर्ण ऊर्जा परिवर्तन में केवल कोयले पर निर्भरता घटाना नहीं, बल्कि श्रमिकों के भविष्य, युवाओं के वैकल्पिक रोजगार और विस्थापित परिवारों के अधिकारों की ठोस योजना शामिल होनी चाहिए। विकास का आकलन बिजली उत्पादन से नहीं, बल्कि जीवन स्तर, स्वास्थ्य और पर्यावरण से होना चाहिए।









