अमित मिश्रा
O- स्वामी हरसेवानन्द विद्यालय चुर्क की बस में सवार थे छात्र-छात्राएं; चालक की सूझबूझ से टला बड़ा हादसा
O- स्कूली वाहनों की फिटनेस पर बड़ा सवाल, RTO, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से अभिभावकों ने मांगा जवाब
सोनभद्र। मारकुंडी घाटी में सोमवार दोपहर स्वामी हरसेवानन्द विद्यालय, चुर्क की बच्चों से भरी बस का अचानक ब्रेक फेल हो गया। बस अनियंत्रित हुई तो चालक ने सूझबूझ दिखाते हुए उसे पहाड़ की ओर मोड़ दिया। बस पहाड़ से टकराकर रुक गई। गनीमत रही कि बस में सवार सभी छात्र-छात्राएं सुरक्षित बच गए।
स्वामी हरसेवानन्द विद्यालय, चुर्क, वाराणसी के गड़वा घाट आश्रम से संचालित विद्यालय व्यवस्था से जुड़ा बताया जाता है। स्कूल की छुट्टी के बाद बस मारकुंडी, सलखन, पटवध, चोपन समेत आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को उनके घर छोड़ने जा रही थी।
मारकुंडी पुरानी घाटी में दुर्गा मंदिर के पास दूसरे मोड़ पर उतरते समय अचानक बस का ब्रेक फेल हो गया। घाटी के ढलान पर बस के अनियंत्रित होने के बाद चालक ने तत्काल निर्णय लेते हुए बस को पहाड़ की तरफ मोड़ दिया। टक्कर के बाद बस रुक गई और एक संभावित बड़ी त्रासदी टल गई।
घटना के बाद बच्चों को दूसरी बस से उनके घर भेजा गया। बच्चों के सुरक्षित होने की जानकारी मिलने पर अभिभावकों ने राहत की सांस ली।
हादसा टला, लेकिन अब जवाबदेही जरूरी
यह घटना सिर्फ एक बस के ब्रेक फेल होने की कहानी नहीं है। यह सवाल है कि बच्चों को लेकर चलने वाले वाहन की तकनीकी सुरक्षा की निगरानी कितनी गंभीरता से की जा रही है?
सबसे बड़ा सवाल परिवहन विभाग से है,
क्या इस बस की फिटनेस वैध थी?
ब्रेक सिस्टम की आखिरी जांच कब हुई थी?
वाहन की फिटनेस जांच में ब्रेक की वास्तविक स्थिति का परीक्षण हुआ था या नहीं?
यदि बस सभी सुरक्षा मानकों को पूरा कर रही थी तो ब्रेक फेल होने की तकनीकी वजह क्या थी?
ARTO के सामने सबसे बड़ा सवाल
स्कूली बसों की फिटनेस और सड़क पर संचालन की वैधानिकता की जांच परिवहन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में अब यह सामने आना चाहिए कि संबंधित बस का फिटनेस प्रमाणपत्र, परमिट, बीमा और अन्य जरूरी दस्तावेज वैध थे या नहीं।
सिर्फ कागजों पर फिटनेस और सड़क पर वाहन की वास्तविक स्थिति, दो अलग-अलग सवाल हैं।
मारकुंडी जैसी घाटी में बच्चों से भरी बस का ब्रेक फेल होना बताता है कि स्कूल वाहनों की जांच केवल औपचारिकता नहीं हो सकती।
जिलाधिकारी प्रशासन और शिक्षा विभाग भी ले संज्ञान
घटना के बाद जिलाधिकारी प्रशासन और बेसिक शिक्षा विभाग के सामने भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं।
जिले में संचालित स्कूल वाहनों की सुरक्षा को लेकर क्या नियमित समीक्षा होती है?
क्या स्कूल प्रबंधन से बच्चों को ले जाने वाले वाहनों की फिटनेस का रिकॉर्ड लिया जाता है?
क्या पुराने स्कूल वाहनों का भौतिक निरीक्षण कराया जाता है?
और सबसे महत्वपूर्ण,
क्या अगली दुर्घटना होने का इंतजार किए बिना अब जिले के सभी स्कूली वाहनों की विशेष जांच होगी?
विद्यालय प्रबंधन की जिम्मेदारी भी तय हो
बच्चों की सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी विद्यालय प्रबंधन की भी है। जिस वाहन से छात्र-छात्राओं को रोजाना स्कूल और घर लाया-ले जाया जाता है, उसकी स्थिति पर स्कूल प्रबंधन को गंभीर निगरानी रखनी चाहिए।
अब यह भी जांच का विषय है कि संबंधित बस की सर्विसिंग कब हुई थी, ब्रेक सिस्टम की तकनीकी जांच कब हुई थी और वाहन को बच्चों के परिवहन के लिए किस प्रक्रिया के तहत लगाया गया था।
आज चालक ने बचा लिया, लेकिन व्यवस्था कब जागेगी?
मारकुंडी में सोमवार को एक चालक की सूझबूझ ने बच्चों की जिंदगी बचा ली।
लेकिन सड़क सुरक्षा व्यवस्था चालक की किस्मत और सूझबूझ के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
अगर बस पहाड़ से टकराने के बजाय घाटी की तरफ चली जाती तो तस्वीर कितनी भयावह होती, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
इसलिए इस घटना की तकनीकी जांच के साथ-साथ स्कूल वाहन सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा जरूरी है।
अभिभावकों की मांग
अभिभावकों ने पुराने और संदिग्ध हालत वाले स्कूल वाहनों की जांच कराने तथा सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले वाहनों को बच्चों के परिवहन से हटाने की मांग की है।
सवाल सिर्फ एक बस का नहीं, सैकड़ों बच्चों की सुरक्षा का है
मारकुंडी की घटना में बच्चे सुरक्षित हैं, यह राहत की खबर है।
लेकिन अब असली परीक्षा प्रशासन की है।
क्या RTO पूरे मामले की तकनीकी जांच करेगा?
क्या जिलाधिकारी प्रशासन स्कूल वाहनों की विशेष जांच कराएगा?
क्या शिक्षा विभाग विद्यालयों से सुरक्षा प्रमाणित कराएगा?
क्या स्कूल प्रबंधन पुराने वाहनों की स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करेगा?
क्योंकि,
हादसा टलना व्यवस्था की सफलता नहीं है। ऐसी स्थिति पैदा ही न हो, यही असली सुरक्षा व्यवस्था की सफलता है।






