अमित मिश्रा
सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक गंभीर और चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। एक ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने की दिशा में काम कर रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत इन प्रयासों पर सवाल खड़े कर रही है।

96 पद, सिर्फ 32 डॉक्टर सिस्टम पर बड़ा सवाल
नीति आयोग द्वारा गोद लिए गए सोनभद्र के स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज में हालात बेहद चिंताजनक हैं।
- 96 स्वीकृत जूनियर रेजिडेंट डॉक्टरों के सापेक्ष सिर्फ 32 ही कार्यरत
- करीब 50 डॉक्टर लंबे समय से बिना सूचना के गायब
- कई डॉक्टरों के हॉस्टल रूम तक बंद पड़े मिले
यह आंकड़े साफ तौर पर स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर करते हैं।

दोहरी मार: कमी भी, मनमानी भी
मेडिकल कॉलेज इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रहा है, एक तरफ डॉक्टरों की भारी कमी, दूसरी तरफ तैनात डॉक्टरों पर अत्यधिक कार्यभार
एमबीबीएस के बाद सरकार के साथ हुए 3 साल के अनिवार्य बांड के बावजूद कई डॉक्टर सेवा देने से कतरा रहे हैं।
प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद अनुपस्थित डॉक्टरों की वापसी नहीं हो रही, जिससे स्थिति और बिगड़ती जा रही है।

इमरजेंसी सेवाएं प्रभावित, मरीज बेहाल
डॉक्टरों की इस भारी कमी का सीधा असर:
- इमरजेंसी सेवाओं पर दबाव
- मरीजों को समय पर इलाज नहीं
- गंभीर मामलों में रेफर की बढ़ती मजबूरी
सबसे ज्यादा खामियाजा आम मरीज को भुगतना पड़ रहा है।
प्रशासन सख्त, खाली होंगे कमरे
कॉलेज प्रबंधन अब कार्रवाई के मूड में है:
- अनुपस्थित डॉक्टरों के हॉस्टल कमरे खाली कराने की तैयारी
- नियमों के तहत आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया तेज

वेतन में देरी भी बनी वजह
कुछ जूनियर डॉक्टरों ने वेतन भुगतान में देरी को लेकर नाराजगी जताई है। एक तरफ सरकार की सख्त गाइडलाइन, दूसरी तरफ डॉक्टरों की अपनी समस्याएं।
इन दोनों के बीच पिस रहा है आम आदमी ।
क्या बोले जिम्मेदार अधिकारी

डॉ. तपन कुमार मंडल (अपर चिकत्साधीक्षक) का बयान:
“कॉलेज में जूनियर डॉक्टरों की भारी कमी है। कई डॉक्टर बिना सूचना के अनुपस्थित हैं। उन्हें नोटिस जारी किया गया है, लेकिन अब तक स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है। इससे स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।”
जूनियर रेजिडेंट डाक्टर – डॉ. अखिलेश कुमार का बयान:
“डॉक्टरों पर काम का दबाव काफी बढ़ गया है। जो मौजूद हैं, वही पूरी व्यवस्था संभाल रहे हैं। यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो सेवाएं और प्रभावित हो सकती हैं।”

नीति आयोग के जिले में बदहाल व्यवस्था
नीति आयोग द्वारा गोद लिए गए सोनभद्र में यह स्थिति और भी गंभीर मानी जा रही है।
जहां पहले से ही स्वास्थ्य सुविधाएं चुनौती हैं, वहां डॉक्टरों की कमी और लापरवाही ने व्यवस्था को कमजोर कर दिया है।

बड़ा सवाल?
क्या स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित रह जाएगी?
या फिर जमीनी स्तर पर भी जवाबदेही तय होगी?
समाधान क्या है ?
– सख्त प्रशासनिक कार्रवाई
– बांड नियमों का पालन सुनिश्चित
– वेतन व सुविधाओं में सुधार
– नियमित मॉनिटरिंग
सरकार की मंशा मजबूत है, लेकिन जमीनी लापरवाही और सिस्टम की कमजोरी बड़े संकट का कारण बन रही है। अब वक्त है कि ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि मरीजों का भरोसा कायम रह सके।






