विवादित जमीन पर विधायक निधि का दुरुपयोग: सोनभद्र में लैंड स्कैम ने कानून के राज को कटघरे में किया खड़ा

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अमित मिश्रा 8115577137

जिला मजिस्ट्रेट के न्यायालय में चल रहा है विवादित जमीन का मुकदमा

विधायक निधि से बेठीगांव निस्फ ग्राम पंचायत में पास है यात्री सेड

लसड़ा ग्राम पंचायत में विवादित जमीन पर बन रहा है यात्री सेड

सोनभद्र(उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में स्टेट हाईवे चौड़ीकरण से जुड़े बहुचर्चित लैंड स्कैम ने अब एक नया और ज्यादा गंभीर मोड़ ले लिया है। जिस विवादित भूमि पर मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से स्टे लागू है, उसी जमीन पर विधायक निधि से 9 लाख रुपये की लागत से यात्री शेड निर्माण की स्वीकृति सामने आना प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक आदेशों-दोनों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

स्टे के बावजूद निर्माण: किस आदेश पर, किसकी अनुमति से?

लसड़ा गांव स्थित जिस भूमि पर यह निर्माण प्रस्तावित है, वह पहले ही

संदिग्ध पट्टों, मुआवज़े में कथित हेराफेरी और अवैध कब्ज़े के आरोपों के चलते प्रशासनिक और न्यायिक जांच के दायरे में है।

जांच लंबित रहने तक पूरी भूमि पर स्टे लगाया गया था, ताकि यथास्थिति बनी रहे।
इसके बावजूद उसी ज़मीन पर सार्वजनिक निर्माण की अनुमति दिया जाना यह सवाल पैदा करता है कि- इस जमीन पर जिलाधिकारी ने 11 फरवरी के आदेश में कहा कि सुनवाई के दौरान शासकीय अधिवक्ता राजस्व उपस्थित रहे प्रतिवादी उपस्थित नहीं रहा इस जमीन पर 22 मार्च 2026 तक स्टे प्रभावी रहेगा । मुकदमे की अगली सुनवाई 25 मार्च को होनी है ।

क्या विधायक निधि पर न्यायालयीन आदेश लागू नहीं होते?

क्या स्टे केवल आम नागरिकों के लिए होता है? और क्या जिला प्रशासन को इस निर्माण की जानकारी थी या नहीं?

यह वही जमीन है, जहां मुआवज़ा वितरण में कथित अनियमितताओं, फर्जी पट्टों और अवैध कब्ज़े के आरोपों के बाद मामला सार्वजनिक हुआ था। खबरों के सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने स्वयं स्वीकार किया था कि पूरी भूमि पर स्टे लागू कर दिया गया है, ताकि जांच प्रभावित न हो और यथास्थिति बनी रहे। लेकिन इसके बावजूद उसी स्थल पर सरकारी धन से निर्माण की प्रक्रिया शुरू होना इस आशंका को और मजबूत करता है कि कार्रवाई सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि स्टे की स्थिति में किसी भी प्रकार का निर्माण न केवल न्यायालय की अवमानना है, बल्कि यह साक्ष्यों को प्रभावित करने का भी सीधा प्रयास माना जा सकता है। ऐसे मामलों में प्रशासन की भूमिका बेहद संवेदनशील होती है, लेकिन सोनभद्र प्रकरण में प्रशासनिक चुप्पी और निर्माण की अनुमति ने संदेह को और गहरा कर दिया है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब भूमि पर स्टे लागू है, तो विधायक निधि से निर्माण की संस्तुति किस आधार पर दी गई। क्या संबंधित विभागों ने जानबूझकर न्यायालयीन आदेशों की अनदेखी की, या फिर पूरे प्रकरण में गंभीर प्रशासनिक लापरवाही हुई। दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।

यात्री शेड नहीं, कानून का सवाल ?

प्रशासनिक हलकों में यह तर्क दिया जा रहा है कि निर्माण जनहित में है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि
स्टे लगी ज़मीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है, चाहे वह जनप्रतिनिधि द्वारा स्वीकृत हो या नहीं।

पूर्व न्यायिक अधिकारियों के अनुसार,
यदि निर्माण कार्य जारी रहता है तो यह न केवल

स्टे आदेश का उल्लंघन होगा
बल्कि, जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की आशंका भी पैदा करेगा।

सबूतों पर स्थायी पर्दा डालने की आशंका, विशेषज्ञों का कहना है कि जिस भूमि पर सीमांकन विवादित है।

पट्टा दस्तावेज़ संदेह के घेरे में हैं और मुआवज़े की प्रक्रिया जांचाधीन है

वहां स्थायी निर्माण होने से भविष्य में ज़मीनी साक्ष्य जुटाना लगभग असंभव हो सकता है।
इस कारण यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि
निर्माण कार्य घोटाले से जुड़े तथ्यों को स्थायी रूप से ढकने का माध्यम बन सकता है।

इस यात्री शेड को ग्रामीण अभियंत्रण प्रखंड सोनभद्र (आरईडी) द्वारा लगभग 9 लाख रुपए की लागत से बनाया जा रहा है । अधिशाषी अभियंता नूर आलम ने बताया कि विभाग द्वारा यात्री शेड बनाया जा रहा है । इस यात्री शेड के विवादित जमीन के संबंध में मेरे पास कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है । अगर ऐसी कोई बात होगी तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी

स्थल के चयन के संबंध में बताया कि मुझे चयन करके कार्य दिया जाता है और प्रस्ताव पर निर्माण कार्य कराया जाता है ।

बताते चलें कि लसड़ा गांव में बन रहे यात्री शेड का प्रस्ताव विधायक निधि से बेठीगांव निफ्स के लिए किया है, जबकि यात्री शेड का निर्माण दूसरे ग्राम पंचायत के लसड़ा के विवादित जमीन पर किया जा रहा है

स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि अगर यही स्टे किसी आम नागरिक की जमीन पर होता, तो प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता। लेकिन जब मामला प्रभावशाली लोगों, सरकारी परियोजनाओं और जनप्रतिनिधियों की निधि से जुड़ा हो, तो कानून की धार अचानक कुंद पड़ जाती है। यही दोहरा मापदंड अब इस लैंड स्कैम को एक जिले की समस्या से आगे ले जाकर पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बना रहा है।

यह मामला अब केवल यात्री शेड निर्माण का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या न्यायालय के आदेशों के रहते सरकारी धन से कोई भी निर्माण वैध ठहराया जा सकता है। यदि इस पर तत्काल रोक नहीं लगी और स्वतंत्र जांच नहीं हुई, तो यह एक खतरनाक नज़ीर बनेगी, जहां स्टे आदेश सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।

प्रशासनिक चुप्पी पर बढ़ते सवाल

अब तक जिला प्रशासन की ओर से, न तो निर्माण रोकने का स्पष्ट आदेश जारी किया गया है, न ही यह स्पष्ट किया गया है कि स्टे के बावजूद स्वीकृति कैसे दी गई ।

यह चुप्पी ही अब प्रशासन की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है।

अब निगाहें जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर टिकी हैं। सवाल साफ है, क्या स्टे उल्लंघन पर निर्माण कार्य रोका जाएगा, क्या जिम्मेदार अधिकारियों और निर्णय लेने वालों की भूमिका तय होगी, या फिर यह मामला भी समय के साथ दबा दिया जाएगा। सोनभद्र की यह जमीन अब यह तय करेगी कि कानून वास्तव में सबके लिए समान है या सिर्फ काग़ज़ों में।

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