राज्यमार्ग चौड़ीकरण के नाम पर करोड़ों का जमीनी घोटाला..?

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O- सदर तहसील अधिकारी और राजस्व कर्मी सवालों के घेरे में….

सोनभद्र । राज्यमार्ग (स्टेट हाईवे) चौड़ीकरण की आड़ में सरकारी जमीन पर बड़े पैमाने पर पट्टा वितरण का मामला आज तूल पकड़ चुका है। लसड़ा ग्राम पंचायत की आराजी संख्या 230 में करोड़ों की जमीन अपात्र लोगों को पट्टों में बांटी गई, जिससे तहसील और राजस्व प्रशासन की साख पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पट्टों में उल्लिखित चौहद्दी में उत्तर में केवल ‘रास्ता’ लिखा गया है, जिसका नाम तक नहीं है, दक्षिण में ‘नदी’, पूरब में अरजी संख्या 230 का शेष रकबा और पश्चिम में अनीता देवी का नाम दर्शाया गया है। जानकारों का कहना है कि यह स्पष्ट रूप से जमीन को किसी की नजर में न आने देने की योजना प्रतीत होती है। यह वही भूमि है जो प्रस्तावित कलवारी–खलियारी स्टेट हाईवे के चौड़ीकरण में शामिल है और अब फिर से विवादों के केंद्र में आ गई है। इस प्रकरण का संबंध पिछले वर्ष सामने आए लसड़ा गांव पट्टा घोटाले से भी जुड़ा हुआ है, जब भीड़भाड़ वाले नियमों का दुरुपयोग कर अपात्रों को लाभ दिया गया था।

विभागी सिस्टम पर  सवाल…

अब वही जमीन एक बार फिर से विवादों में घिरी हुई है। प्रशासन ने मामले में कार्रवाई की शुरुआत कर दी है। लेखपाल को निलंबित कर दिया गया है, जबकि उपजिलाधिकारी ने अपने स्टेनो, कानूनगो, नायब तहसीलदार और तहसीलदार के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश जिलाधिकारी सोनभद्र को भेजी है। इसके साथ ही पट्टों को निरस्त करने की प्रक्रिया भी प्रस्तावित की गई है।

इस पूरे “घटनाक्रम को देखते हुए संदीप मिश्रा बताते है पट्टे घोटाले मे पहले अधिकारी नियमों के तहत पट्टों को सही बताते थे, वहीं अब वही अधिकारी कार्रवाई की बात कर रहे हैं। किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने सभी दोषियों की निष्पक्ष जांच और उपजिलाधिकारी के सदर तहसील से हटाने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उच्चस्तरीय जांच नहीं हुई, तो यह मामला केवल मोहरे बदलने तक सीमित रह जाएगा”……?

इस प्रकरण मे सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले तथाकथित एक संदिग्ध दलाल की सक्रिय भूमिका रही। दलाल के बहुत करीबी बताए जाते हैं सर्किल के कानूनगो अवधेश तिवारी यह संबंध कोई नया नहीं है बल्कि पूर्व में अवधेश तिवारी ग्राम सभा लसड़ा सर्किल क्षेत्र के लेखपाल हुआ करते थे तभी से साँठ – गाँठ चली आ रहा है वर्तमान में बड़े पोस्ट पर पहुंचने के बाद भी चल रहा है दोनों बड़े अधिकारियों, बड़े नेताओं के बहुत ही करीबी बताए जाते हैं जिसकी वजह से तमाम क्षेत्र में फर्जी कार्य करने वाले काम मोटी कमाई का जरिया बनाकर करते रहते हैं।

क्या उपजिलाधिकारी या जिलाधिकारी मामले मे शामिल अन्य दोषियों पर कार्यवाही करेंगे या लेखपाल के निलंबन के तक सिमट के रह जाएगा? सोनभद्र का यह मामला अब स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, भू-राजस्व प्रबंधन और भ्रष्टाचार पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन चुका है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या राज्यमार्ग परियोजनाओं के नाम पर सरकारी जमीन का संगठित अपहरण और मुआवजा घोटाला चल रहा है, और क्या कार्रवाई केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित रहेगी जबकि उच्च अधिकारियों और राजनीतिक संरक्षण वाले लोग बच जाएंगे। निगाहें अब शासन और जिला प्रशासन की इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर टिकी हैं।

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