दक्षिणांचल के बेटे ने हिंदी शोध से रचा इतिहास

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सी एस पाण्डेय

O- मिट्टी से महाविद्यालय तक, ग्रामीण युवाओं के लिए बना राष्ट्रीय प्रेरणा स्रोत

बभनी (सोनभद्र) । दक्षिणांचल के आदिवासी बहुल क्षेत्र से निकलकर एक किसान परिवार के बेटे ने हिंदी साहित्य में ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जो आज पूरे देश के ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया है। सोनभद्र जिले के बभनी ब्लॉक अंतर्गत कोँगा गांव निवासी परमेश्वर प्रसाद यादव ने हिंदी साहित्य में “21वीं सदी की हिंदी कहानियों में अभिव्यक्ति परिवर्तनकामी चेतना” विषय पर शोध कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।

किसान गुलाब चंद यादव के पुत्र परमेश्वर की जीवन यात्रा खेतों की मिट्टी से शुरू होकर देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों तक पहुंची। आदिवासी बाहुल्य गांव में सीमित संसाधनों के बीच जन्मे परमेश्वर ने प्रारंभिक शिक्षा बनवासी सेवा आश्रम के विद्यालय से प्राप्त की, जहां किताबें कम लेकिन सपने असीम थे। इसके बाद उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज दुद्धी से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की।

आर्थिक तंगी के बावजूद पिता की मेहनत और स्वयं की लगन ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया। हिंदी साहित्य के प्रति गहरी रुचि उन्हें देश की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक ले गई, जहां उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। यहीं से हिंदी कहानियां उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गईं।

समाज में तेजी से हो रहे बदलाव—ग्रामीण से शहरी पलायन, टूटती परंपराएं और नई पीढ़ी की बेचैनी—ने उनके भीतर सवाल खड़े किए। इन्हीं सवालों ने उन्हें शोध की दिशा में आगे बढ़ाया। जेआरएफ/नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोध के लिए प्रवेश लिया। प्रोफेसर मीना कुमारी मिश्रा के मार्गदर्शन में उन्होंने पीएचडी का कार्य प्रारंभ किया।

अपने शोध में परमेश्वर यादव ने 21वीं सदी की हिंदी कहानियों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने संजीव, उदय प्रकाश और गीतांजलि श्री जैसे रचनाकारों की कहानियों में छिपी उस चेतना को रेखांकित किया, जो केवल पीड़ा का चित्रण नहीं करती, बल्कि समाज को बदलाव के लिए जागृत करती है। उनका शोध यह दर्शाता है कि आधुनिक हिंदी कहानियां व्यक्ति को संघर्ष और परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं।

परमेश्वर यादव की यह संघर्षगाथा केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों ग्रामीण युवाओं के लिए संदेश है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को सीमित मान लेते हैं। उनकी पीएचडी शोध जल्द ही पुस्तक रूप में प्रकाशित होने जा रही है, जो हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी।

छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना यह साबित करता है कि यदि संकल्प मजबूत हो, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।

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