अमित मिश्रा
O- एनजीटी व सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएँ दाख़िल कर चुके पर्यावरण प्रहरी
म्योरपुर (सोनभद्र)। सोनभद्र और सिंगरौली की धरती पर बढ़ते प्रदूषण के विरुद्ध एक अकेला सिपाही वर्षों से जंग लड़ रहा है। नोबेल पुरस्कार विजेता गुरु रवींद्रनाथ टैगोर के गीत ‘एकला चलो रे’ की पंक्तियाँ पर्यावरण कार्यकर्ता जगत नारायण विश्वकर्मा पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। गरीबी और संघर्षों में पले-बढ़े इस युवक ने न सिर्फ अपनी राह खुद तराशी, बल्कि पूरे परिक्षेत्र की हवा और पानी की लड़ाई भी खुद ही उठाई।
छत्तीसगढ़ सीमा से लगे म्योरपुर ब्लॉक के ग्राम पंचायत फरीपान निवासी श्री विश्वकर्मा कभी मजदूरी और तेंदूपत्ता तोड़कर अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करते थे। जूनियर कक्षाओं की फीस से लेकर आगे की पढ़ाई तक कभी ट्यूशन पढ़ाकर, तो कभी अख़बार बेचकर इन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी।
आज यही युवक एनजीटी में जनहित याचिकाएँ दायर कर, क्षेत्र की भयावह पर्यावरणीय स्थिति पर एम्स और आईआईटी के विशेषज्ञों की टीम बुलवाकर, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
पांगन नदी पर अवैध खनन रोकने की मिसाल
साल 2012 की दीपावली।
जब पांगन नदी पर अवैध खनन चरम पर था और खनन माफिया, सफेदपोश तथा पुलिस की मिलीभगत से आम लोग डर के साये में थे—तब जगत नारायण विश्वकर्मा सांकेतिक अनशन पर बैठ गए।
बहुतों ने सोचा कि इसका कोई असर नहीं होगा, लेकिन परिणाम चौंकाने वाले रहे।
खनन माफिया झुकने को मजबूर हुए और पांगन नदी का अवैध खनन तत्काल बंद हो गया। इसके बाद से आज तक कोई दोबारा झाँकने की हिम्मत नहीं कर पाया।
सिंगरौली–सोनभद्र के प्रदूषण को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया
क्षेत्रीय उद्योगों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण पर आवाज उठाते हुए श्री विश्वकर्मा ने बीबीसी, तहलका, डाउन टू अर्थ, एनडीटीवी जैसे बड़े मीडिया संस्थानों को भी स्थिति से अवगत कराया।
इसके बाद सिंगरौली ज़ोन का प्रदूषण देशभर में चर्चा का विषय बन गया।
उनका कहना है
“चुनौतियों पर बात तो सब करते हैं, पर कदम बहुत कम लोग बढ़ाते हैं। अगर कोई एक कदम बढ़ाए, तो दस कदम साथ चलने वाले खुद जुड़ जाते हैं।”
दो कपड़ों में दिल्ली का सफर और जनरल बोगी की कहानी
जनहित के मामलों पर दिल्ली पहुँचने के लिए जब आरक्षित टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने बिना हिचक जनरल बोगी में अख़बार बिछाकर बैठते-लेटते पूरा सफर तय किया।
उनका जीवन आज भी सादगी का उदाहरण है। सिर्फ दो जोड़ी कपड़े, एक पहने हुए और दूसरा धुलकर सूखने के लिए।
बलिया नाला के प्रदूषण पर भी उठाई आवाज
राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले श्री विश्वकर्मा कई बार दुद्धीचुआ के बलिया नाला का निरीक्षण करवाने के लिए एनजीटी व पर्यावरण वैज्ञानिकों की टीम ला चुके हैं।
कोयला युक्त पानी के बहाव व इसके प्रभावों पर विस्तृत रिपोर्ट की मांग भी लगातार करते रहे हैं।
जंग जारी है…
गरीबी, संघर्ष और सीमित साधनों के बावजूद जगत नारायण विश्वकर्मा ने जिस दृढ़ता से सिंगरौली–सोनभद्र क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई लड़ी है, वह आज पूरे समाज के लिए मिसाल है।
यह कहानी बताती है कि अकेला व्यक्ति भी यदि ठान ले, तो बड़े बदलाव की राह बना सकता है।







