O- पर्यावरण मंजूरी के अभाव में पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट पर रोक
सोनभद्र। ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे उत्तर प्रदेश के कदम को फिलहाल झटका लगा है। सोनभद्र जिले में प्रस्तावित आठ पंप स्टोरेज पॉवर परियोजनाओं (PSP) को केंद्र सरकार ने पर्यावरणीय मंजूरी न मिलने तक रोक दिया है। यह वही परियोजनाएं थीं, जिनसे 2030 तक राज्य की बिजली उत्पादन क्षमता को लगभग तीन गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था।
राज्य सरकार ने 2023 में सोनभद्र को ‘एनर्जी हब’ बनाने की दिशा में योजना तैयार की थी। बैजनाथ, सोमा, ससनई, चिचलिक, झरिया, पनौरा और बसुहारी जैसे गांवों में पंप स्टोरेज प्लांट लगाए जाने थे, जिनसे 32,000 मेगावॉट से अधिक बिजली उत्पादन की संभावना थी। बरसाती सीजन में सोन नदी के जल को संग्रहित कर जरूरत पड़ने पर टरबाइन चलाकर बिजली बनाने की यह आधुनिक तकनीक महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में पहले ही सफल हो चुकी है।
पर्यावरणीय अनुमति पर अटकी परियोजना
केंद्र सरकार ने इस योजना को मंजूरी देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का विस्तृत अध्ययन कराने का निर्णय लिया है। लगभग 616 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैली परियोजनाओं से दो लाख से अधिक वृक्षों की कटाई की आशंका जताई गई है। यह इलाका नगवां ब्लॉक के घने जंगलों में आता है, जहां जैव विविधता और वन्यजीवों की प्रचुरता पाई जाती है।
पर्यावरण मंत्रालय के एक विशेषज्ञ ने कहा, “सोनभद्र की पारिस्थितिकी पहले से ही औद्योगिक दबाव झेल रही है। इतने बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई से यह क्षेत्र स्थायी रूप से प्रभावित हो सकता है।”
केंद्र ने एक विशेष उपसमिति गठित की है, जो स्थल की भौगोलिक स्थिति, वन्यजीव, जल संसाधन और पर्यावरणीय जोखिमों का मूल्यांकन कर रिपोर्ट सौंपेगी। उसी रिपोर्ट के आधार पर परियोजना का भविष्य तय होगा।
राज्य सरकार की तैयारी और निवेशकों की चिंता
उत्तर प्रदेश सरकार ने पंप स्टोरेज को अपनी प्राथमिक परियोजनाओं में शामिल किया था। निवेशक सम्मेलन 2022 में सोनभद्र को भारी निवेश प्रस्ताव मिले थे। ग्रीनको ग्रुप ने 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना की रूपरेखा बनाई थी, जबकि जेएसडब्ल्यू, अदाणी, टोरेंट और THDC जैसी कंपनियों ने भी रुचि दिखाई थी।
जिला प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार, स्थानों की पहचान, सर्वेक्षण और ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। लेकिन मंजूरी में देरी से कंपनियों में असमंजस की स्थिति है। कई निवेशकों ने वैकल्पिक स्थल की मांग की है।
सूत्र बताते हैं कि 17 अक्टूबर को लखनऊ में उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई है, जिसमें आठों परियोजनाओं की स्थिति की समीक्षा की जाएगी।
स्थानीय लोगों में निराशा, विकास की उम्मीद अधर में
सोनभद्र के नगवां और कोन क्षेत्र लंबे समय से अविकसित माने जाते हैं। यहां बिजली, स्वास्थ्य और सड़क जैसी सुविधाएं सीमित हैं। स्थानीय निवासी बृजेश यादव कहते हैं,
“हमारे गांव में आज तक कोई फैक्ट्री नहीं लगी। इस परियोजना से रोजगार और विकास की उम्मीद जगी थी, पर अब मंजूरी रुकने से लोग निराश हैं।”
परियोजना की घोषणा के बाद क्षेत्र में जमीनों की खरीद-बिक्री बढ़ गई थी, पर अब माहौल ठंडा पड़ गया है। व्यापारी शिवप्रकाश चौबे बताते हैं, “लोगों ने सोचा था कि सोनभद्र अब सिर्फ कोयले का जिला नहीं रहेगा, बल्कि आधुनिक उद्योगों का केंद्र बनेगा। अब सब कुछ अनिश्चित लग रहा है।”
ऊर्जा आत्मनिर्भरता को झटका
सोनभद्र में फिलहाल 12,800 मेगावॉट से अधिक बिजली उत्पादन हो रहा है, जिसमें अनपरा, ओबरा, रिहंद और सिंगरौली की इकाइयां शामिल हैं। अगर पंप स्टोरेज परियोजनाएं शुरू हो जातीं, तो राज्य को 30 हजार मेगावॉट से अधिक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मिलती।
ऊर्जा विशेषज्ञ अजय प्रताप सिंह के अनुसार,
“पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट से उत्तर प्रदेश को पीक लोड के समय पर्याप्त बिजली मिलती और सौर ऊर्जा की अनियमितता को संतुलित किया जा सकता था। मंजूरी में देरी ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को धीमा करेगी।”
विकास बनाम पर्यावरण की बहस फिर तेज
सोनभद्र पहले से ही औद्योगिक विस्तार के कारण पर्यावरणीय दबाव झेल रहा है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों और खनन कार्यों ने यहां की हवा और जल गुणवत्ता को प्रभावित किया है।
पर्यावरण विशेषज्ञ उत्पल पाठक का कहना है,
“स्थायी विकास का अर्थ सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी है। यदि नई परियोजनाएं लानी हैं, तो सख्त पर्यावरण मानकों के साथ ही लानी होंगी।”







