तिलभांडेश्वर महादेव: द्वापर युग से लोगों का कर रहे कल्याण

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शिवम गुप्ता

हर वर्ष एक तील के आकार मे बढ़ जाता है शिवलिंग

वाराणसी।भगवान शंकर की बसाई नगरी काशी में उनके विभिन्न रूप है। काशी के कण-कण में विराजमान उनके स्वरूपों के अलग अलग कहानी है। केदारखंड के सोनारपुरा क्षेत्र में स्थित तिलभांडेश्वर महादेव द्वापर युग से भक्तों को दर्शन देकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर रहे है।

शिव व काशी पुराण के अनुसार द्वापर युग में सोनारपुरा क्षेत्र में तील की खेती होती थी उसी तील के खेत में तील का एक पेड़ और पेड़ों की अपेक्षा कुछ बड़ा दिख रहा था। कौतुहल बस किसानों ने जब उस पेड़ की कटाई की तो उसके अंदर से एक स्वयंभू शिवलिंग दिखाई दिया । ग्रामीण उसकी पूजा अर्चना करने लगे और हर वर्ष शिवलिंग का आकार एक तिल के बराबर बढ़ जाता था। धीरे धीरे इस स्थान पर लोग पूजा अर्चना करने लगे।

इस दौरान कर्नाटक से आए वीभांडव ऋषि ने इसे मंदिर का स्वरूप दिया और लोग विधि विधान से पूजा अर्चना करने लगे। ऐसी मान्यता है कि पहले बीभाडव ऋषि जो इस समय शिवलिंग के रूप में तिलभांडेश्वर मंदिर में भूमि तल पर स्थापित है उनकी पूजा अर्चना करके तिलभांडेश्वर महादेव का पूजा अर्चना करने का विधान है । तिलभांडेश्वर महादेव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह हर वर्ष एक तील के आकार मे बढ़ जाते हैं।

वही दूसरी तरफ इनके मस्तक पर विराजमान सूर्य और चंद्र ग्रह विराजमान । पुराणों के अनुसार तिलभांडेश्वर महादेव का दर्शन पूजन करने से सूर्य और चंद्र ग्रह अनुकूल होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

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