अखिलेश सिंह
O- जिलाधिकारी तक खामोश
“जिनकी कुर्बानी से मिली थी आज़ादी की सुबह,
उनके सिरहाने अब गंदगी और बदबू की दुर्गंध पहरा दे रही है।”
रामगढ़ बाजार का शहीद स्मारक इस 15 अगस्त पर गर्व और सम्मान का केंद्र बनने के बजाय शर्म और उपेक्षा का गवाह बन गया। स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब देशभर में शहीदों के बलिदान का गुणगान हो रहा था, यहां न माल्यार्पण हुआ, न साफ-सफाई। चारों ओर बस कूड़े के ढेर, पॉलिथीन की परतें और पेशाब की दुर्गंध फैली रही।
चार सफाईकर्मी नियुक्त होने के बावजूद ग्राम पंचायत ने अपनी जिम्मेदारी से आंखें मूंद लीं। स्मारक के बगल में ग्राम पंचायत भवन, साधन सहकारी समिति और बैंक मौजूद हैं, लेकिन न किसी कर्मचारी ने आगे बढ़कर सफाई की, न किसी अधिकारी ने शहीदों को श्रद्धांजलि देने की जहमत उठाई। ग्राम प्रधान की चुप्पी और निष्क्रियता इस लापरवाही की सबसे बड़ी गवाह है।
“जिन्होंने लहू बहाया था हमारी सांसों की कीमत चुकाने को,
हमने कूड़े से ढक दिया उनका नाम, शर्म करो!”
गांव के वरिष्ठ नागरिक बताते हैं कि वर्षों पहले, जब यह स्मारक बना था, यहां हर राष्ट्रीय पर्व पर लोग फूल लेकर आते थे, बच्चे राष्ट्रगान गाते थे, और स्मारक के चारों ओर तिरंगे लहराते थे। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि स्मारक के पीछे कूड़ा डालना और पेशाब करना आम बात हो गई है। मानो यह स्मारक शहीदों का नहीं, किसी सुनसान कचरा घर का प्रतीक हो।
प्रशासन और जिलाधिकारी की खामोशी
इस शर्मनाक स्थिति की जानकारी प्रशासन, यहां तक कि जिलाधिकारी तक को है। फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह चुप्पी सवाल खड़े करती है ? क्या हमारे लिए शहीद सिर्फ भाषणों और परेड के दिन याद करने की वस्तु हैं? अगर हां, तो यह हमारी सामूहिक नैतिक हार है।
“सरकारी कुर्सियां इतनी ऊंची हो गईं कि उन्हें शहीदों की कब्रें नजर ही नहीं आतीं।”
आज़ादी की विभीषिका से आज का सच
1947 की आज़ादी कोई उपहार नहीं थी, यह लाखों बलिदानों, यातनाओं, जेलों और मौत की कतार से होकर आई थी। लेकिन 2025 में, उन्हीं बलिदानों की याद को कूड़े में दबा देना, उस इतिहास को कलंकित करना है।
“तिरंगा हवा में लहरा कर खुश मत हो,
जब तक शहीदों की मिट्टी साफ न हो।”
जनता का आक्रोश और मांग
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से तत्काल सफाई, स्मारक की मरम्मत, और इसे सुरक्षित व सम्मानजनक बनाने की मांग की है। लोगों का कहना है कि अगर जिलाधिकारी और पंचायत अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, तो नागरिक खुद सफाई अभियान चलाएंगे, लेकिन साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जनआंदोलन भी करेंगे।
“शहादत का मोल अगर भाषणों और मिठाइयों तक सीमित कर दिया,
तो आने वाली पीढ़ियां हमें कायर और कृतघ्न कहेंगी।”
आज रामगढ़ बाजार का शहीद स्मारक सिर्फ एक गंदा कोना नहीं, बल्कि यह हमारी मानसिकता और प्रशासन की नाकामी का आईना है। यह चेतावनी है, शहीदों को भूलने वाले समाज का भविष्य भी भुला दिया जाता है।







