अमित मिश्रा
O- संरक्षण से जुगैल आदिवासी अंचल में रोजगार और विकास के खुल सकते हैं नए द्वार
म्योरपुर (सोनभद्र)। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पहाड़ियों में छिपी प्राकृतिक संपदा एक बार फिर चर्चा में है। ओबरा तहसील क्षेत्र के जुगैल–परसोई और सिंदुरिया इलाके में कीमती मिनी रत्न और विशेष खनिज बड़ी मात्रा में पाए जाने के संकेत मिले हैं। इनमें स्फटिक (क्वार्ट्ज), जैस्पर और अगेट जैसे खनिज शामिल हैं, जो पहाड़ियों से लेकर किसानों के खेतों तक प्राकृतिक रूप से बिखरे पड़े हैं।
भू-विशेषज्ञ एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विभूति राय के अनुसार, ये खनिज केवल आभूषण और सजावटी वस्तुओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके वैज्ञानिक, औद्योगिक और आध्यात्मिक उपयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इनका संरक्षण और नियंत्रित उपयोग समय की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।
⚠️ अवैध संग्रहण से बढ़ता खतरा
स्थानीय ग्रामीणों—जीतलाल, सोबरन, धर्मेंद्र और उमेश चौबे—का कहना है कि जानकारी के अभाव और अवैध संग्रहण के कारण इन मिनी रत्नों को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। कई बार लोग इन्हें साधारण पत्थर समझकर या बिना वैज्ञानिक सलाह के निकाल लेते हैं, जिससे प्राकृतिक संरचना और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह दोहन बिना योजना के जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह अनमोल धरोहर समाप्त हो सकती है।
👥 रोजगार का बन सकता है बड़ा आधार
जुगैल आदिवासी क्षेत्र होने के कारण यहां के हजारों युवा रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि मिनी रत्नों का वैज्ञानिक संरक्षण कर उन्हें हस्तशिल्प, आभूषण निर्माण और लघु उद्योगों से जोड़ा जाए, तथा बाहरी अवैध हस्तक्षेप को रोका जाए, तो हजारों युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकता है। उचित प्रशिक्षण और सरकारी सहयोग से न केवल क्षेत्रीय विकास होगा, बल्कि राज्य के राजस्व में भी वृद्धि संभव है।
🌱 भू-विरासत स्थल की मांग
विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सुझाव है कि वन विभाग, खनन विभाग और जिला प्रशासन के समन्वय से इन क्षेत्रों में भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, सीमांकन और जागरूकता अभियान चलाए जाएं। इन इलाकों को “भू-विरासत स्थल” के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिससे अवैध दोहन पर रोक लगेगी और शोध, शिक्षा व नियंत्रित पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
पर्यावरणविदों का कहना है कि सोनभद्र पहले से ही खनन और औद्योगिक दबाव झेल रहा है। ऐसे में मिनी रत्नों का संरक्षण सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। प्रो. विभूति राय के अनुसार, सही नीति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्थानीय सहभागिता से यह क्षेत्र न केवल अपनी प्राकृतिक संपदा बचा सकता है, बल्कि पहचान और रोजगार का नया मार्ग भी प्रशस्त कर सकता है।
💎 शोध में मिले प्रमुख मिनी रत्न
- स्फटिक (Quartz Crystal): पारदर्शी पत्थर, ज्योतिष व आभूषण निर्माण में उपयोग
- लाल जैस्पर: सजावटी वस्तुएं, मूर्तियां और आभूषण
- आध्यात्मिक उपयोग: ताबीज, माला, कंगन और अंगूठियां—सुरक्षा व सकारात्मक ऊर्जा के लिए







