अभिषेक अग्रहरी
O- ओबरा तहसील में साल की अंतिम लोक अदालत पर उठे सवाल
ओबरा (सोनभद्र) । देशभर में आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत को आम नागरिकों के लिए त्वरित, सुलभ और सस्ते न्याय का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। वर्ष की अंतिम लोक अदालत से विशेष तौर पर यह उम्मीद की जाती है कि लंबे समय से लंबित छोटे विवाद, बैंक ऋण, पारिवारिक झगड़े और आपसी सहमति से निपटाए जा सकने वाले मामले एक ही दिन में समाप्त होंगे। लेकिन उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की ओबरा तहसील में आयोजित वर्ष की अंतिम राष्ट्रीय लोक अदालत ने इस व्यवस्था की ज़मीनी चुनौतियों को उजागर कर दिया।
लोक अदालत की अवधारणा केवल मामलों के निस्तारण तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य संवाद, मध्यस्थता और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देना है, ताकि अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके और आमजन को वर्षों तक मुकदमेबाजी से राहत मिले। खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में, जहां कानूनी संसाधनों और जानकारी की कमी रहती है, लोक अदालत को न्याय की पहली सीढ़ी माना जाता है।
ओबरा तहसील में आयोजित लोक अदालत के दौरान हालांकि औपचारिक प्रक्रिया पूरी की गई, लेकिन दोपहर बाद तहसील परिसर में गतिविधियाँ लगभग ठप पड़ती नजर आईं। दूर-दराज़ से आए नागरिक, जो न्याय की आस लेकर पहुंचे थे, खाली परिसर और सीमित सुनवाई देखकर मायूस लौट गए। कई लोगों का कहना था कि इतनी उम्मीद के साथ आने के बाद निराशा हाथ लगना व्यवस्था पर भरोसे को कमजोर करता है।
कानूनी जानकारों के अनुसार देश में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इसी कारण लोक अदालतों को वैकल्पिक न्याय व्यवस्था के रूप में सशक्त किया गया था। यह मंच विशेष रूप से गरीब, मजदूर और कमजोर वर्गों के लिए महत्वपूर्ण है, जो लंबी कानूनी प्रक्रिया का खर्च और समय वहन नहीं कर पाते। लेकिन जब लोक अदालतें केवल औपचारिकता बनकर रह जाएं, तो उनका उद्देश्य ही प्रभावित होता है।
ओबरा तहसील की स्थिति यह संकेत देती है कि लोक अदालतों के प्रभावी संचालन के लिए केवल तारीख तय करना पर्याप्त नहीं है। समयबद्ध सुनवाई, संबंधित अधिकारियों की सक्रिय मौजूदगी और आमजन के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो राष्ट्रीय स्तर पर चल रही यह महत्वपूर्ण न्यायिक पहल भी कागजों तक सिमट कर रह सकती है।
वर्ष की अंतिम लोक अदालत से लौटे लोगों की निराशा यह सवाल खड़ा करती है कि क्या त्वरित न्याय की यह अवधारणा ज़मीनी स्तर पर उसी गंभीरता से लागू हो पा रही है, जैसी इसकी परिकल्पना की गई थी। जब तक इस पर आत्ममंथन और सुधार नहीं होगा, तब तक न्याय की यह उम्मीद अधूरी ही बनी रहेगी।







