आस्था, विरासत और विकास के बीच उलझा काशी

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O-पुनर्विकास कार्य ने क्यों खड़ा किया देशव्यापी सियासी तूफान?

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)। काशी का मणिकर्णिका घाट केवल अंतिम संस्कार का स्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, मृत्यु-दर्शन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। इसी ऐतिहासिक घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्य ने इन दिनों एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप ले लिया है। जनवरी 2026 में निर्माण कार्य के दौरान कुछ प्राचीन मूर्तियों और कलात्मक अवशेषों के मलबे में दिखाई देने के वीडियो सामने आने के बाद देश की राजनीति गरमा गई है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए दृश्यों में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी मूर्तियों और चबूतरों को नुकसान पहुंचने के आरोप लगाए गए। इसके बाद मामला केवल काशी तक सीमित न रहकर लखनऊ और दिल्ली तक सियासी बहस का विषय बन गया।

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विवाद की जड़ कहां है?

लगभग डेढ़ वर्ष तक बाढ़ के कारण रुकी परियोजना को 10 जनवरी से पुनः शुरू किया गया। 13 जनवरी को सीढ़ियों और एक प्राचीन चबूतरे को हटाने के दौरान कुछ मूर्तियां मलबे में दिखाई दीं। इन्हीं दृश्यों ने स्थानीय समुदाय, विशेषकर पाल समाज में आक्रोश पैदा किया। 14 जनवरी को घाट परिसर में विरोध प्रदर्शन हुआ और आरोप लगाया गया कि अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया।

विपक्ष का आक्रामक रुख

इस मुद्दे को सबसे पहले कांग्रेस ने उठाया। पार्टी की वाराणसी इकाई ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि विकास की आड़ में काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को क्षति पहुंचाई जा रही है, जैसा कि पहले काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के दौरान हुआ।

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समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने तीखा हमला करते हुए कहा कि काशी की अविनाशी परंपरा ही सत्ताधारी दल के पतन का कारण बनेगी। वहीं प्रियंका गांधी ने इसे सांस्कृतिक धरोहर को मिटाने का प्रयास करार दिया।

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भी पुनर्विकास कार्य की तस्वीरें साझा करते हुए 20 जनवरी को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की।

अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी संवेदनशीलता

यह विवाद इसलिए भी अत्यंत भावनात्मक है क्योंकि मणिकर्णिका घाट का निर्माण 1771 में अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था और 1791 में इसका जीर्णोद्धार भी उन्हीं के द्वारा हुआ। घाट परिसर में उनकी स्मृति से जुड़ी चार मूर्तियां स्थापित थीं।
महारानी अहिल्याबाई ट्रस्ट और इंदौर राजपरिवार ने भी इस घटनाक्रम पर आपत्ति जताई। ट्रस्ट अध्यक्ष यशवंत होल्कर ने गुरुधाम मंदिर पहुंचकर शुद्धि पूजन किया और कहा कि बिना ट्रस्ट की सहमति किसी भी प्रकार का स्वरूप परिवर्तन स्वीकार्य नहीं होगा। ट्रस्ट का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार घाट के संरक्षण की जिम्मेदारी उन्हीं पर है।प्रशासन का पक्ष

प्रशासन का पक्ष

जिला प्रशासन ने सभी आरोपों को निराधार बताया है। जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार के अनुसार किसी भी मूर्ति या मंदिर को क्षति नहीं पहुंचाई गई है। खुदाई के दौरान प्राप्त अवशेषों को संरक्षण हेतु उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग को सौंप दिया गया है।
प्रशासन का कहना है कि कुछ वीडियो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की मदद से भ्रामक ढंग से प्रसारित किए गए हैं और दोषियों की पहचान की जा रही है।

पुनर्विकास योजना का खाका

करीब 18 से 25 करोड़ रुपये की लागत से चल रही इस परियोजना का पूरा खर्च रूपा फाउंडेशन के सीएसआर फंड से किया जा रहा है। योजना के अंतर्गत आधुनिक श्मशान प्लेटफॉर्म, प्रदूषण नियंत्रण चिमनियां, प्रतीक्षालय, पंजीकरण कक्ष और हरित क्षेत्र विकसित किए जाएंगे।
इस परियोजना का शिलान्यास 7 जुलाई 2023 को नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था और लक्ष्य जून 2026 तक कार्य पूर्ण करने का है।बड़ा सवाल

बड़ा सवाल

मणिकर्णिका घाट का विवाद अब एक स्थान विशेष की कहानी नहीं रह गया है। यह उस बड़े प्रश्न का प्रतीक बन चुका है, जहां विकास और विरासत आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। काशी जैसे नगर में, जहां हर पत्थर इतिहास बोलता है, वहां विकास की हर ईंट अत्यंत संवेदनशील सवाल खड़े करती है। सरकार इसे सुविधाओं और पर्यावरण सुधार से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष इसे आस्था और इतिहास पर चोट मानता है।
काशी जैसे नगर में, जहां परंपरा और स्मृति हर कदम पर मौजूद है, वहां किसी भी बदलाव की गूंज दूर तक सुनाई देती है।

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