अमित मिश्रा
O- विलुप्त होते देसी खेलों को पुनर्जीवन, बुजुर्गों से युवाओं तक मैदान में उतरी पीढ़ियाँ, मुख्यमंत्री योगी ने की पहल की सराहना
सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के सुदूर और आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र से एक ऐसी पहल सामने आई है, जो खेल को केवल प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि संस्कृति, सामाजिक समरसता और प्रतिभा निखारने का सशक्त माध्यम बना रही है। सोनभद्र सदर विधायक भूपेश चौबे द्वारा शुरू किया गया विधायक खेल महाकुंभ अब राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनता जा रहा है।
इस आयोजन की विशेषता यह है कि यह न सिर्फ कबड्डी, खो-खो और रस्साकसी जैसे विलुप्त होती पारंपरिक खेलों को फिर से मैदान में ला रहा है, बल्कि दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में रहने वाली प्रतिभाओं को पहचान और मंच भी प्रदान कर रहा है। जिन युवाओं के लिए संसाधनों और अवसरों की कमी अब तक सबसे बड़ी बाधा थी, उनके लिए यह प्रतियोगिता आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का नया रास्ता खोल रही है।
खेल महाकुंभ का यह दूसरा संस्करण है, लेकिन इसकी गूंज पहले ही प्रदेश की सीमाओं से बाहर सुनाई देने लगी है। प्रतियोगिता के दौरान बुजुर्गों द्वारा खेली गई रस्साकसी ने यह संदेश दिया कि खेल किसी उम्र का मोहताज नहीं। इसी मानवीय और सांस्कृतिक पक्ष ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी ध्यान खींचा, जिन्होंने इस पहल की खुले मंच से सराहना की।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खेल महाकुंभ आदिवासी युवाओं में न केवल खेल कौशल, बल्कि अनुशासन, नेतृत्व और राष्ट्रीय पहचान की भावना विकसित कर रहा है। खेल के माध्यम से सामाजिक दूरी कम हो रही है और गांव, वनांचल व शहर के बीच की खाई पाटने का कार्य हो रहा है।
अब यह मांग तेज हो रही है कि सोनभद्र में सफल रहा यह मॉडल पूरे उत्तर प्रदेश और देश के अन्य आदिवासी व ग्रामीण क्षेत्रों में लागू किया जाए। यदि ऐसा होता है, तो आने वाले समय में भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ग्रामीण और आदिवासी पृष्ठभूमि से निकले खिलाड़ी मिल सकते हैं।
“विधायक खेल महाकुंभ आज केवल एक स्थानीय आयोजन नहीं, बल्कि यह साबित करता है कि यदि नीयत और नीति सही हो, तो खेल गांवों से निकलकर देश की पहचान बन सकता है”।







