शिक्षा का ‘धंधा’ : जहां डिग्री बिकती है, उम्मीदें टूटती हैं

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अमित मिश्रा

सोनभद्र । शिक्षा को मंदिर कहा गया है, गुरु को भगवान। लेकिन जब यही मंदिर “ठगी का मंडप” बन जाए और भगवान ही “दलाल” की भूमिका में दिखे, तो गरीब छात्राओं की आस्था का क्या हश्र होगा? घोरावल की छात्राओं की चीख यही कहानी बयां कर रही है।

बी.बी. पैरामेडिकल एंड नर्सिंग इंस्टीट्यूट के अंतर्गत चल रहे बीरमती विद्या महाविद्यालय ने शिक्षा का कारोबार इस अंदाज़ में सजाया कि भोली-भाली लड़कियां समझ ही नहीं पाईं कि वे विद्या के आंगन में नहीं, बल्कि ठगी के अखाड़े में प्रवेश ले रही हैं।

किसी से डेढ़ लाख, किसी से ढाई लाख और किसी से ढाई लाख से भी ज्यादा की रकम लेकर जब हाथ में “फर्जी प्रवेश पत्र” और “कागज़ी अंक पत्र” थमा दिए गए, तो सपना नहीं, एक बड़ा धोखा हाथ आया।

छात्राओं ने जब प्राचार्य से सवाल पूछा, तो जवाब मिला, “हम तुम्हारा कोई एग्जाम नहीं कराएंगे, जो करना हो जाकर कर लो।” यानी शिक्षा का सौदागर अब खुलेआम चुनौती दे रहा है। सवाल पूछने पर छात्राओं को कालेज से ऐसे भगा दिया गया, मानो वे पढ़ाई करने नहीं, उधारी चुकाने पहुंची हों।

प्रबंधन पर आरोप यह भी है कि कालेज का संचालन किसी विश्वविद्यालय की तर्ज पर नहीं, बल्कि “पान-गुटखा की दुकान” की तरह हो रहा है। फीस की रसीदें कागज़ पर तो मिल जाती हैं, लेकिन पढ़ाई और परीक्षा सिर्फ हवा-हवाई बातें हैं।

यह विद्यालय समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक रमेश चंद्र दुबे का बताया जा रहा है, विद्यालय अपनी माता के नाम पर चला रहे है । इतना ही नहीं पूर्व विधायक कई विद्यालयों का संचालन भी करते है । छात्रों ने इनके विद्यालय की जांच कराने की मांग कर रहे है ताकि किसी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ ना करें ।

समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक / प्रबंधक रमेश चंद्र दुबे को सत्ता पार्टी भाजपा का करीबी भी बताया जा रहा है ।

छात्राओं ने कहा कि उन्होंने उपजिलाधिकारी से भी गुहार लगाई, लेकिन वहां भी मिला सिर्फ टका-सा जवाब, “एक हफ्ते बाद आइए।” हफ्ता गुजरा, महीना गुजरा, लेकिन न्याय नहीं मिला। उल्टे आरोप लगे कि एसडीएम साहब प्रबंधन से मिलकर शोषण करवाने का खेल खेल रहे हैं।

शुक्रवार को जब ये छात्राएं कलेक्ट्रेट पहुंचीं, तो उनका आक्रोश साफ दिखा। हाथों में ज्ञापन और आंखों में आंसू लिए वे जिलाधिकारी से सिर्फ एक ही मांग कर रही थीं हमें ठगों से बचाइए, हमारी मेहनत की गाढ़ी कमाई वापस दिलाइए।”

यह केवल कुछ छात्राओं की पीड़ा नहीं है। यह उस शिक्षा तंत्र की पोल खोलती है, जहां गरीब और असहाय बच्चों को ऊंचे सपने दिखाकर लाखों रुपये ऐंठे जाते हैं। जहां डिग्री बिकती है और भविष्य गिरवी रख दिया जाता है।

अब सवाल सिर्फ यही है, क्या प्रशासन इन शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसेगा, या फिर गरीब छात्राओं की पुकार भी फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगी?

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