दलित समीकरण पर BJP की नज़र, वाल्मीकि अवकाश से कितना बदलेगा सियासी गणित?

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है। पंचायत और विधानसभा चुनावों की आहट के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाल्मीकि जयंती पर सरकारी अवकाश की घोषणा कर एक अहम कदम उठाया है। इसे BJP की दलित वोटबैंक साधने की रणनीति माना जा रहा है।

छुट्टी का सियासी मतलब

2017 में सत्ता में आने के बाद योगी सरकार ने कई छुट्टियां खत्म कर दी थीं, जिनमें वाल्मीकि जयंती भी शामिल थी। तर्क था कि काम के दिन बढ़ाकर विकास की रफ्तार तेज़ करनी होगी। लेकिन वाल्मीकि समाज की लगातार मांग और हालिया ज्ञापनों के बाद 7 अक्टूबर को अवकाश बहाल करने का फैसला लिया गया। बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह “सम्मान का प्रतीक” है, वहीं जानकार मानते हैं कि इसमें चुनावी संदेश भी छिपा है।

दलित राजनीति में वाल्मीकि समाज की ताक़त

प्रदेश की करीब 21% दलित आबादी में वाल्मीकि समाज का हिस्सा लगभग ढाई करोड़ माना जाता है। पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में इनकी भूमिका चुनावी नतीजे तय करने वाली होती है। 2017 में इस वर्ग ने BSP से हटकर BJP को समर्थन दिया, जिससे कई सीटों पर पार्टी को निर्णायक बढ़त मिली। 2022 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद योगी सरकार ने इस समुदाय से जुड़े नेताओं को भी प्रतिनिधित्व देकर संदेश देने की कोशिश की।

प्रतीकों से राजनीति साधने की कोशिश

BJP लंबे समय से सामाजिक समूहों को जोड़ने के लिए प्रतीकों का सहारा लेती रही है। अयोध्या एयरपोर्ट का नाम “महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा” करना, निवेश सम्मेलन के मंच को वाल्मीकि नाम देना और मंदिरों में कौशल विकास केंद्र शुरू करना इसी रणनीति का हिस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कई बार महर्षि वाल्मीकि के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा है कि “रामकथा उनके बिना अधूरी है।”

दलित समीकरण का बदलता स्वरूप

कभी BSP के इर्द-गिर्द घूमने वाली दलित राजनीति अब बदल रही है। जाटव समाज जहां बसपा की रीढ़ माना जाता है, वहीं छोटे दलित समुदाय अब BJP की ओर आकर्षित हो रहे हैं। RSS और BJP नेतृत्व ने वाल्मीकि समाज को बार-बार मंच देकर यह दिखाया है कि पार्टी उन्हें “मुख्यधारा की पहचान” देने पर जोर दे रही है। चित्रकूट में बन रहा वाल्मीकि संग्रहालय इसी का उदाहरण है।

विपक्ष का पलटवार

विपक्षी दलों का कहना है कि BJP का यह कदम सिर्फ चुनावी दिखावा है। समाजवादी पार्टी का आरोप है कि दलित बस्तियों की स्थिति और शिक्षा-रोजगार की समस्याएं जस की तस हैं, जबकि चुनाव से पहले केवल प्रतीक गढ़े जा रहे हैं। सपा ने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठजोड़ का नारा देकर बीजेपी को चुनौती देने का दावा किया है।

आने वाला समय तय करेगा असर

BJP मान रही है कि प्रतीकों और प्रतिनिधित्व के ज़रिये वह वाल्मीकि समाज को अपने साथ मजबूती से खड़ा कर लेगी। लेकिन विपक्ष का विश्वास है कि वास्तविक मुद्दों पर दलित समाज उनके साथ आएगा। चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि वाल्मीकि अवकाश का यह फैसला बीजेपी को दलित राजनीति में और गहरी पैठ दिला पाएगा या नहीं।

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