O- 2027 की तैयारी में चेहरा नहीं, संगठन बना हथियार
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर दिखते हों, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी मशीनरी को अभी से पूरी तरह सक्रिय कर दिया है। पार्टी नेतृत्व ने प्रदेश के सभी 84 संगठनात्मक जिलों में विशेष पर्यवेक्षकों (ऑब्ज़र्वर) की तैनाती कर यह साफ संकेत दे दिया है कि अब चुनावी तैयारी का केंद्र व्यक्ति नहीं, संगठन होगा।
पिछले दिनों नए ज़िला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद लिया गया यह फैसला BJP के उस नए फॉर्मूले की ओर इशारा करता है, जिसमें माइक्रो-मैनेजमेंट के ज़रिये ज़मीनी स्तर तक पकड़ मज़बूत की जा रही है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इन पर्यवेक्षकों को सिर्फ रिपोर्टिंग की भूमिका नहीं दी गई है, बल्कि उन्हें संगठन के भीतर समन्वय, अनुशासन और दिशा तय करने की अहम ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।
निगरानी से आगे की भूमिका
इन पर्यवेक्षकों का काम सांसदों, विधायकों, एमएलसी और ज़िला पदाधिकारियों के बीच तालमेल बनाना, अंदरूनी खींचतान को नियंत्रित करना और यह सुनिश्चित करना है कि ज़िला इकाई किसी गुट या चेहरे के हिसाब से नहीं, बल्कि केंद्रीय रणनीति के अनुसार काम करे।
एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, “पर्यवेक्षक संगठन की नब्ज़ पर हाथ रखते हैं। वे यह देखते हैं कि ज़मीनी इकाइयाँ पार्टी की सोच के साथ चल रही हैं या नहीं।”
2024 से मिला सबक
BJP नेतृत्व मानता है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाना सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों का परिणाम नहीं था। संगठनात्मक शिथिलता, मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे और सामाजिक संदेश की कमजोरी भी बड़ी वजह रही।
इसी पृष्ठभूमि में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद ज़िलों में निगरानी तंत्र मज़बूत किया गया है, ताकि परंपरागत समर्थक वर्गों में किसी भी तरह की चूक दोबारा न हो।
नेतृत्व परिवर्तन का संकेत
केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी के भीतर यह संदेश भी गया कि अब निर्णय लेने में देरी और असमंजस का दौर खत्म किया जाएगा। चौधरी लगातार ज़िलों का दौरा कर रहे हैं और स्थानीय नेतृत्व से सीधे फीडबैक ले रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 84 ज़िलों में पर्यवेक्षकों की तैनाती उनके उसी इरादे का विस्तार है, समय रहते संगठन पर पकड़ बनाना और 2027 की लड़ाई को अभी से दिशा देना।
सामाजिक संतुलन की नई गणित
इस संगठनात्मक कवायद के साथ BJP के भीतर सामाजिक समीकरणों पर भी गहन मंथन चल रहा है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो पार्टी नेतृत्व में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, भूमिहार और ओबीसी वर्गों को संतुलित प्रतिनिधित्व दिया गया है।
विशेष रूप से ओबीसी नेतृत्व की मज़बूत मौजूदगी, चाहे संगठन हो या सरकार-BJP की दीर्घकालिक सामाजिक रणनीति को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं, बल्कि सत्ता संरचना में प्रभावी भागीदारी का संकेत है।
दलित और महिला वोट पर विशेष फोकस
आने वाले समय में BJP का अगला बड़ा फोकस दलित और महिला मतदाता हैं। संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर दलित प्रतिनिधित्व को और मज़बूत करने की योजना पर काम चल रहा है, खासकर गैर-जाटव दलितों और युवा वोटरों को साधने के लिए।
वहीं, उज्ज्वला, आवास और मिशन शक्ति जैसी योजनाओं से बने महिला समर्थन को संगठनात्मक ताकत में बदलने की तैयारी है। ज़िला और मंडल स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर गंभीर मंथन हो रहा है।
ज़मीनी चुनौतियाँ बरकरार
हालांकि पार्टी की यह रणनीति चुनौतियों से मुक्त नहीं है। कानपुर और मुरादाबाद जैसे जिलों में संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता स्वीकार करते हैं, “अगर अंदरूनी मतभेदों को अभी नहीं संभाला गया, तो चुनाव के समय इसका सीधा असर दिखेगा। पर्यवेक्षक इसी खतरे को समय रहते रोकने के लिए लगाए गए हैं।”







