स्टेट हाईवे लैंड स्कैम: कार्रवाई काग़ज़ों में सिमटी, ज़मीन पर जस का तस कब्ज़ा, क्या सिस्टम बचा रहा है करोड़ों का घोटाला?

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अमित मिश्रा

सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) । सोनभद्र के लसड़ा गांव से सामने आया स्टेट हाईवे चौड़ीकरण से जुड़ा करोड़ों रुपये का लैंड-मुआवज़ा घोटाला अब केवल एक ज़मीनी अनियमितता नहीं रह गया है। यह मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही बनाम सत्ता-संरक्षित भ्रष्टाचार की सीधी परीक्षा बन चुका है। घोटाले का खुलासा, लेखपाल का निलंबन और जांच के दावे किए जा चुके हैं, लेकिन जिस जमीन पर पूरा खेल हुआ, वहां आज भी अवैध कब्ज़ा जस का तस बना हुआ है।

यही तथ्य अब प्रशासन की मंशा पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

अगर घोटाला उजागर है, तो कब्ज़ा क्यों नहीं हटा?

जानकारों और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन वास्तव में निष्पक्ष कार्रवाई चाहता, तो सबसे पहला कदम अतिक्रमण हटाने का होता। लेकिन कई दिन बीत जाने के बावजूद न तो बुलडोज़र चला, न जमीन को सरकारी नियंत्रण में लिया गया, न ही मौके पर कोई स्पष्ट कार्रवाई दिखी।

इस देरी ने आशंका को और गहरा कर दिया है कि अतिक्रमण जानबूझकर नहीं हटाया जा रहा, क्योंकि जैसे ही जमीन खाली होगी, पट्टा, मुआवज़ा और भुगतान से जुड़े कई ऐसे तथ्य सामने आएंगे, जो सिर्फ निचले कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेंगे।

आराजी संख्या 230 और काग़ज़ी खेल

मामला आराजी संख्या 230 से जुड़ा है, जिसे कथित तौर पर संदिग्ध पट्टों के ज़रिये स्टेट हाईवे परियोजना के तहत मुआवज़े के दायरे में लाया गया। आरोप है कि पट्टों की चौहद्दी में जानबूझकर हेरफेर की गई और स्टेट हाईवे का उल्लेख तक गायब कर दिया गया, ताकि जमीन की वास्तविक स्थिति छिपी रहे।

यानी काग़ज़ों में जमीन वैध, लेकिन ज़मीनी सच्चाई उससे बिल्कुल उलट।

अब जब यह घोटाला सार्वजनिक हो चुका है, तब भी कब्ज़ा बना रहना इस बात का संकेत देता है कि प्रशासनिक संरक्षण के बिना यह संभव नहीं।

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का तीखा हमला

इस पूरे मामले को लेकर भाजपा नेता धर्मवीर तिवारी ने जिलाधिकारी से मुलाकात कर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहाये

“अगर घोटाला सामने आ चुका है, तो अवैध कब्जे क्यों नहीं हटाए गए? साफ है कि कुछ अधिकारी इस खेल में हिस्सेदार हैं। जब तक जमीन खाली नहीं होगी, निलंबन जैसी कार्रवाई सिर्फ दिखावा है।”

वहीं किसान–नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने प्रशासन पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया-

“गरीब और किसान पर कानून तुरंत चलता है, लेकिन जब अधिकारी और उनके संरक्षण में लोग जमीन लूटते हैं, तो प्रशासन आंख मूंद लेता है। अतिक्रमण न हटना इस बात का सबूत है कि भ्रष्ट अधिकारी खुद को बचाने में लगे हैं।”

उन्होंने मांग की कि न सिर्फ कब्ज़ा तत्काल हटाया जाए, बल्कि उन अधिकारियों की भी पहचान हो, जिन्होंने कार्रवाई को जानबूझकर रोके रखा है।

ग्रामीणों का आरोप: यह लापरवाही नहीं, सुनियोजित चुप्पी है

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जमीन पर कब्ज़ा बना रहना कोई तकनीकी या कानूनी अड़चन नहीं, बल्कि सुनियोजित चुप्पी है। उनका दावा है कि जैसे ही अतिक्रमण हटेगा, यह साफ हो जाएगा कि

  • पट्टा किसके आदेश पर बना
  • मुआवज़े की संस्तुति किस स्तर पर हुई
  • और भुगतान किन-किन की सहमति से हुआ

यही वजह है कि फाइलें आगे बढ़ती दिख रही हैं, लेकिन ज़मीनी कार्रवाई पूरी तरह ठप है

सिर्फ सोनभद्र नहीं, सिस्टम का सवाल

लसड़ा गांव का यह मामला अब केवल एक जिले या एक परियोजना तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल खड़ा करता है कि
क्या भूमि अधिग्रहण और मुआवज़ा प्रणाली में भ्रष्टाचार को केवल निलंबन और जांच के नाम पर दबा दिया जाता है?
और क्या ज़मीनी कार्रवाई जानबूझकर इसलिए टाली जाती है, ताकि बड़े नाम बेनकाब न हों?

अंतिम सवाल

अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं।

क्या अवैध कब्ज़ा हटाकर यह साबित किया जाएगा कि कानून सबके लिए बराबर है?
या फिर यह जमीन यूं ही कब्ज़े में रहकर बताती रहेगी कि स्टेट हाईवे लैंड स्कैम को भीतर ही भीतर संरक्षण मिला हुआ है?

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