धूल, प्रदूषण और चुप्पी, घुटती साँसें, विकास की कीमत चुका रहा है ओबरा

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अभिषेक अग्रहरी

O- विकास की कीमत पर घुटता जनजीवन

O- चुप्पी या संघर्ष, अब फैसला नगर को करना होगा

ओबरा (सोनभद्र)। ओबरा नगर आज जिस स्थिति में खड़ा है, वह किसी एक दिन की चूक या किसी एक परियोजना का परिणाम नहीं है। यह वर्षों की चुप्पी, उपेक्षा और बिखरती सामाजिक चेतना का नतीजा है। कभी स्वच्छता, अनुशासन और नियोजित नागरिक जीवन के लिए पहचाना जाने वाला यह औद्योगिक नगर अब ऐसे मोड़ पर आ गया है, जहाँ विकास और जनस्वास्थ्य के बीच का संतुलन बुरी तरह बिगड़ता दिखाई दे रहा है।

सत्तर के दशक में जब ओबरा में पहली तापीय विद्युत परियोजना की नींव रखी गई थी, तब इसे एक मॉडल औद्योगिक नगर के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई थी। अस्पताल, विद्यालय, इंटर कॉलेज, खेल मैदान, पार्क और सामाजिक संस्थान—सब कुछ इस सोच के साथ खड़ा किया गया कि उत्पादन के साथ-साथ यहाँ रहने वाले नागरिकों का जीवन भी सुरक्षित और गरिमामय रहे। शुरुआती वर्षों में यह सपना काफी हद तक साकार भी हुआ।

लेकिन समय बीतने के साथ-साथ तस्वीर बदलती चली गई। परियोजनाओं का विस्तार हुआ, बिजली उत्पादन बढ़ा, पर नागरिक सुविधाएँ और सामाजिक संस्थान उपेक्षा के शिकार होते गए। अस्पताल बदहाल हुए, प्राथमिक विद्यालय जर्जर हो गए, इंटर कॉलेज आम जन की पहुँच से दूर होता चला गया। कभी जीवंत रहने वाले मैदान और पार्क वीरान पड़ गए और सामाजिक जीवन धीरे-धीरे सिमटता चला गया।

2016 के बाद नई तापीय परियोजनाओं की प्रक्रिया ने एक बार फिर विकास के बड़े वादे किए। कहा गया कि आधुनिक तकनीक, पर्यावरणीय संतुलन और जनसुनवाई के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि नगर और आसपास के गाँवों को नुकसान न हो। लेकिन आज ज़मीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती।

ओबरा नगर की हवा अब कोयले की महीन धूल से भरी हुई है। यह धूल केवल सड़कों या कारखानों तक सीमित नहीं, बल्कि घरों के भीतर तक पहुँच चुकी है। सुबह-शाम सफाई अब मजबूरी बन चुकी है। महिलाओं के लिए यह स्थिति और भी कठिन है, जिनका बड़ा हिस्सा दिन का घरों की धूल हटाने में गुजर जाता है। आँखों में जलन, साँस की तकलीफ, लगातार थकान और चिड़चिड़ापन अब आम लक्षण बनते जा रहे हैं। यह सब एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा कर रहा है।

सड़कों, गलियों और मोहल्लों का काला पड़ना केवल असुविधा नहीं, बल्कि भविष्य के खतरे की चेतावनी है। इसका असर सिर्फ नगर तक सीमित नहीं है। आसपास के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में खेती, जलस्रोत और आजीविका पर इसका सीधा प्रभाव दिखने लगा है।

इसी बीच बड़े पैमाने पर हुई कथित पेड़ कटाई ने लोगों के मन में और अविश्वास पैदा किया है। कागजों में दर्ज आंकड़े और ज़मीनी सच्चाई के बीच का अंतर आम नागरिक साफ महसूस कर रहा है। जिन पेड़ों के बदले पौधरोपण की बात कही गई थी, वे बहुत कम नजर आते हैं। यही अंतर प्रशासन और जनता के बीच भरोसे की खाई को और गहरा करता है।

रेणुका नदी, जो कभी इस क्षेत्र की जीवनरेखा थी, आज प्रदूषण के दबाव में अपनी पहचान खोती जा रही है। इसका असर खेती, जल और गरीब परिवारों की आजीविका पर पड़ रहा है। सोनभद्र पहले ही फ्लोराइड जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में प्रदूषित हवा और पानी ने हालात को और जटिल बना दिया है। बच्चे, बुजुर्ग और श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

इन सबके बीच ओबरा की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है, एकजुटता का अभाव। समस्याएँ सब देख रहे हैं, चर्चाएँ हर चौराहे पर हो रही हैं, लेकिन वे संगठित आवाज़ में नहीं बदल पा रहीं। अलग-अलग विचारधाराएँ, राजनीतिक मतभेद और व्यक्तिगत सीमाएँ सामूहिक चेतना को कमजोर कर रही हैं। यही मौन लापरवाही को ताकत देता है।

यह सवाल किसी एक परियोजना, किसी एक संस्था या किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह उस हर नागरिक का सवाल है, जो स्वच्छ हवा में साँस लेना चाहता है, अपने बच्चों को सुरक्षित भविष्य देना चाहता है और अपने नगर को रहने लायक बनाए रखना चाहता है। विकास जरूरी है, लेकिन जनस्वास्थ्य, पर्यावरण और किए गए वादों की कीमत पर नहीं।

ओबरा आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। या तो नगर इसी तरह चुप रहकर घुटन भरे जीवन को स्वीकार कर ले, या फिर संगठित होकर शांति और दृढ़ता के साथ अपनी बात सामने रखे। इतिहास गवाह है कि जब समाज एकजुट होता है, तब व्यवस्था को जवाब देना ही पड़ता है।

यह समय आरोपों का नहीं, जागरूकता का है।
यह समय डर का नहीं, एकजुटता का है।

क्योंकि अब यह स्पष्ट है – संगठित होंगे, तभी मिलेगा न्याय।

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