रवि पाण्डेय
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई जंग छिड़ गई है—”वोटरों की रखवाली” की लड़ाई। हर राजनीतिक दल मतदाता सूची को लेकर बूथ स्तर तक रणनीति बना रहा है। विपक्ष से लेकर सत्ताधारी दल तक, सबकी कोशिश है कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें फिर से शामिल करवाया जाए। कांग्रेस ने तो इसे “कानूनी मदद” और “जनसंपर्क” दोनों का साधन बना लिया है।
पंचायत चुनाव से पहले तेज़ी
राज्य में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव के मद्देनज़र 19 अगस्त से मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान शुरू हो चुका है। 29 सितंबर तक बीएलओ घर-घर जाकर जानकारी जुटाएंगे। इसके बाद 15 जनवरी को अंतिम सूची प्रकाशित की जाएगी।
ई-बीएलओ ऐप की शुरुआत
निर्वाचन आयोग ने इस बार तकनीक का सहारा लिया है और “ई-बीएलओ मोबाइल एप” लॉन्च किया है। दावा है कि इससे प्रक्रिया पारदर्शी और तेज़ होगी। साथ ही, अच्छे काम करने वाले बूथ अधिकारियों को सम्मानित करने की भी घोषणा की गई है।
विपक्ष के आरोप
वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि बीएलओ पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है और कई जगह पक्षपात की शिकायतें सामने आई हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में गड़बड़ी कर समर्थक वोटरों को जानबूझकर हटाया जा रहा है।
विशेषज्ञों की राय
चुनावी जानकारों का मानना है कि यूपी की राजनीति में “वोट चोरी” अब सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बन चुका है। राजनीतिक विश्लेषक वी. एन. अरोड़ा कहते हैं, “जो पार्टी मतदाता सूची की लड़ाई को जनता से जोड़ देगी, उसे चुनाव में सीधा लाभ मिलेगा। यह केवल प्रक्रिया नहीं बल्कि लोगों के आत्मसम्मान और अधिकार से जुड़ा सवाल है।”
2027 तक बढ़ेगी टक्कर
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पंचायत चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव तक हर दल अपनी पूरी ताक़त लगाएगा कि उसका कोई समर्थक मतदाता सूची से बाहर न हो। यही वजह है कि “वोट रक्षक” से लेकर “न्याय योद्धा” तक के नारों के बीच यूपी में वोटर लिस्ट का मुद्दा सियासत का केंद्र बन गया है।







