आचार्य सुशील तिवारी
O- 10 फरवरी 2026 : फाल्गुन कृष्ण अष्टमी का दिव्य संयोग
O- कीर्तन, ताली और तंत्रिका विज्ञान-सनातन परंपरा की वैज्ञानिक शक्ति
काशी मानक समयानुसार प्रस्तुत वैदिक हिन्दू पंचांग
(स्रोत: वैदिक गणना एवं शास्त्रीय संदर्भ)
दैनिक पंचांग विवरण
- दिनांक: 10 फरवरी 2026
- दिन: मंगलवार
- विक्रम संवत्: 2082
- अयन: उत्तरायण
- ऋतु: शिशिर
- मास: फाल्गुन
- पक्ष: कृष्ण
- तिथि: अष्टमी (प्रातः 07:27 तक) तत्पश्चात् नवमी
- नक्षत्र: विशाखा (प्रातः 07:55 तक) तत्पश्चात् अनुराधा
- योग: ध्रुव (रात्रि 01:42, 11 फरवरी तक) तत्पश्चात् व्याघात
- राहुकाल: अपराह्न 03:31 से 04:55
- सूर्योदय: 07:03
- सूर्यास्त: 18:20
- दिशा शूल: उत्तर दिशा
- ब्रह्ममुहूर्त: प्रातः 05:21 से 06:12
- अभिजीत मुहूर्त: 12:19 से 13:04
- निशिता मुहूर्त: 12:16 से 01:06 (11 फरवरी)
शास्त्रीय निषेध:
नवमी तिथि में लौकी का सेवन गोमांस तुल्य त्याज्य बताया गया है।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण)
विशेष वैदिक विवेचन : कीर्तन में ताली का रहस्य
आज की भागदौड़ और मानसिक तनाव से ग्रस्त मानव के लिए सनातन परंपरा ने जो सरलतम साधना दी है, वह है, भगवन्नाम-कीर्तन एवं प्रेमपूर्वक ताली।
ताली : एक्यूप्रेशर और नाड़ी विज्ञान
वैदिक ऋषियों ने जिस सत्य को सहस्रों वर्ष पूर्व जान लिया था,
आज आधुनिक चिकित्सा उसे Acupressure कहकर स्वीकार कर रही है।
- मानव शरीर में 72,000 नाड़ियाँ मानी गई हैं
- इनके प्रमुख स्विच-बोर्ड हाथों और पैरों में स्थित हैं
- कीर्तन में ताली बजाने से ये बिंदु सक्रिय होते हैं
- इससे
- स्मरणशक्ति
- श्रवणशक्ति
- नेत्रज्योति
- मानसिक संतुलन
- और तंत्रिका-तंत्र
सुदृढ़ होता है
सामूहिक कीर्तन का प्रभाव
एक स्वर में किया गया कीर्तन वातावरण में
सकारात्मक कंपन (Positive Vibrations) उत्पन्न करता है,
जिससे मन स्वतः शुद्ध, स्थिर और प्रसन्न होता है।
शास्त्र व संतवाणी
परमहंस श्री रामकृष्ण देव कहते हैं-
“प्रातः और सायंकाल ताली बजाकर हरिनाम लो।
जैसे पेड़ के नीचे ताली बजाने से चिड़ियाँ उड़ जाती हैं,
वैसे ही देह-वृक्ष से अविद्या रूपी चिड़ियाँ उड़ जाती हैं।
कलियुग में हरिनाम से सरल साधन कोई नहीं।”
आज का संदेश
जहाँ पाश्चात्य संस्कृति, नशा, डिस्को और मानसिक खोखलेपन की ओर ले जाती है,
वहीं सनातन संस्कृति, कीर्तन, ताली और हरिनाम से स्वस्थ शरीर, शांत मन और दिव्य बुद्धि प्रदान करती है।
🕉️ निष्कर्ष
👉 ताली केवल हाथों की ध्वनि नहीं,
👉 यह नाड़ी-शुद्धि, मन-चिकित्सा और आत्म-उत्थान की साधना है।
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