अमित मिश्रा
O- 11 आदिवासियों की शहादत को याद कर ग्रामीणों ने दी श्रद्धांजलि, विवादित जमीन का निस्तारण अभी तक नहीं
सोनभद्र। घोरावल विधानसभा के ऊम्भा गांव में आज से ठीक 6 साल पहले हुए नरसंहार की बरसी पर ग्रामीणों ने शहीद आदिवासियों को श्रद्धांजलि दी। लेकिन, हर साल की तरह इस बार भी प्रशासन ने ग्रामीणों को घटनास्थल तक जाने से रोक दिया।
पुलिस ने लगाए बैरिकेड, श्रद्धांजलि स्थल पर तैनात किया भारी बल
जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रामराज सिंह गौड़ के नेतृत्व में ग्रामीणों ने शहीदों को याद करने के लिए इकट्ठा होने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस प्रशासन और उपजिलाधिकारी घोरावल ने घटनास्थल तक पहुंचने वाले रास्ते को बैरिकेड लगाकर बंद कर दिया। श्रद्धांजलि स्थल के आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
जब रामराज सिंह गौड़ और अन्य ग्रामीण घटनास्थल पर जाने लगे, तो उपजिलाधिकारी और पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद ग्रामीणों ने वहीं पर ज्ञापन सौंपकर अपना विरोध दर्ज कराया।
“सरकार केवल आश्वासन देती है, काम नहीं करती”
रामराज सिंह गौड़ ने कहा, “पिछले साल भी प्रशासन ने जमीन के मामले का निस्तारण करने का आश्वासन दिया था, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। बिजली और नेटवर्क की समस्या भी बनी हुई है। यह सरकार गरीबों और आदिवासियों के खिलाफ है।”
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य आशुतोष कुमार दुबे (आशु) ने कहा, “जहां पूरे देश में 5G नेटवर्क की बात हो रही है, वहीं ऊम्भा जैसी जगह, जहां नरसंहार हुआ और चौकी बनी, वहां आज तक बुनियादी नेटवर्क सुविधा नहीं है। यह प्रशासन की लापरवाही है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और किसानों की आवाज सिर्फ कांग्रेस ही उठा रही है।”
“ऊम्भा कांड छोटी घटना नहीं, लेकिन व्यवस्था नहीं बदली”
ब्लॉक अध्यक्ष लल्लू राम पांडेय ने कहा, “यह कोई छोटी घटना नहीं है, लेकिन आज तक ग्रामीणों को न्याय नहीं मिला। सरकारी व्यवस्थाएं ठीक नहीं हो रही हैं, जो आदिवासियों के साथ अन्याय है।”
श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए सैकड़ों ग्रामीण
कार्यक्रम में एनएसयूआई की जिला अध्यक्ष अंशु गुप्ता, सोशल आउटरीच डिपार्टमेंट के जिला अध्यक्ष सुशील राव, नंदलाल गौड़, बाबुन्दर गोड़, अनीता देवी, रामकुमार गोड़, युवा नेता राजन पांडेय सहित सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।
घटना की पृष्ठभूमि
17 जुलाई 2016 को ऊम्भा गांव में 11 आदिवासियों की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा ने गांव का दौरा किया था, लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर चुनार जेल में रखा गया। यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। लेकिन, छह साल बाद भी पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिला है और विवादित जमीन का मामला लंबित है।
निष्कर्ष
ऊम्भा कांड की छठी बरसी पर एक बार फिर सवाल उठा है कि क्या आदिवासियों को न्याय मिल पाएगा? प्रशासन के रुख से लगता है कि सरकार इस मामले को दबाना चाहती है, जबकि ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है।







