1956 से 2026 तक की फाइलें खुलीं: रॉबर्ट्सगंज प्रधान डाकघर की 2 बीघा सरकारी भूमि पर अवैध खरीद–फरोख्त और निर्माण का आरोप

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रवि पाण्डेय

सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) । सोनभद्र से सामने आया यह मामला अब किसी स्थानीय ज़मीन विवाद से कहीं आगे निकल चुका है। सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और कथित भू-माफिया–अधिकारी गठजोड़ पर यह एक बड़ा और असहज सवाल बनकर उभरा है।
रॉबर्ट्सगंज स्थित प्रधान डाकघर की बहुमूल्य सरकारी भूमि को लेकर सामने आए दस्तावेज़, शिकायतें और विभागीय पत्राचार ने प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

खतौनी बनाम ज़मीनी हकीकत

शिकायतों और राजस्व अभिलेखों के अनुसार, खतौनी में लगभग 2 बीघा भूमि डाक विभाग के नाम दर्ज है। इसके विपरीत, मौके पर सिर्फ 7 बिस्वा भूमि पर ही डाकघर का भवन मौजूद है।
शेष भूमि को कथित रूप से निजी बताकर बेचे जाने और उस पर अवैध निर्माण कराए जाने के आरोप लगे हैं, जो एक संगठित और सुनियोजित प्रक्रिया की ओर इशारा करते हैं।

1956 की खतौनी ने खोले गंभीर सवाल

मामला तब और गंभीर हो गया जब भारतीय डाक के मिर्ज़ापुर मंडल से जारी एक आधिकारिक पत्र सामने आया।
पत्र में वर्ष 1956 की खतौनी का हवाला देते हुए पूछा गया है कि आराज़ी संख्या 392 के अंतर्गत आवंटित 11 बिस्वा भूमि आज कहां है? साथ ही आराज़ी संख्या 392 और 406 को लेकर दर्ज विसंगतियों पर भी स्पष्ट जवाब मांगा गया है।
इन बुनियादी सवालों पर वर्षों बाद भी ठोस उत्तरों का अभाव प्रशासनिक निष्क्रियता की ओर संकेत करता है।

पुराने रिकॉर्ड और नए सौदे

शिकायत में यह भी दर्ज है कि पुराने बंदोबस्त अभिलेखों में संबंधित भूमि का उपयोग पोस्ट ऑफिस, पोस्टमास्टर आवास, पोस्टमैन क्वार्टर समेत डाक विभाग से जुड़े कार्यों के लिए दर्ज है।
इसके बावजूद आरोप है कि राजस्व विभाग और डाक विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी भूमि को निजी दर्शाकर लेन-देन किए गए।

जिला पंचायत का नोटिस, फिर भी निर्माण जारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सोनभद्र ने कथित क्रेता-विक्रेताओं को नोटिस जारी कर तीन दिन में जवाब तलब किया।
हालांकि ज़मीनी हकीकत यह है कि न तो निर्माण कार्य रुका, न ही आरोपी पक्ष ने कार्यालय में उपस्थित होकर जवाब दिया—जिससे प्रशासनिक संरक्षण की आशंका और गहरी हो गई है।

पहले से चिन्हित ‘भू-माफिया’, फिर भी खुला कब्ज़ा

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि जिन लोगों को पहले ही ‘भू-माफिया श्रेणी’ में चिन्हित किया जा चुका है, वही लोग आज डाकघर की सरकारी भूमि पर खुलेआम कब्ज़ा और निर्माण कर रहे हैं।
नोटिस के बाद भी कार्रवाई न होना कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है।

मंडल और जिलाधिकारी तक पहुँचा मामला

शिकायतकर्ताओं ने मिर्ज़ापुर मंडल के आयुक्त और सोनभद्र जिलाधिकारी से मांग की है कि-

  • शेष सरकारी भूमि को तत्काल अवैध कब्ज़े से मुक्त कराया जाए
  • चल रहे निर्माण कार्य पर फौरन रोक लगाई जाए
  • अवैध खरीद-फरोख्त में शामिल भू-माफियाओं और दोषी अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो

केंद्रीय संस्था की ज़मीन असुरक्षित, तो बाकी का क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय डाक जैसी केंद्रीय सरकारी संस्था की भूमि सुरक्षित नहीं है, तो अन्य सरकारी संपत्तियों की स्थिति का अनुमान लगाना कठिन नहीं।
यह मामला अब राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और कानून के शासन की एक निर्णायक परीक्षा बन चुका है।

अब निगाहें प्रशासन पर

अब सवाल स्पष्ट है- क्या प्रशासन डाकघर की 2 बीघा सरकारी ज़मीन को भू-माफिया के कब्ज़े से मुक्त कराकर न्याय सुनिश्चित करेगा?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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