सोनभद्र। अटेवा/एनएमओपीएस संगठन द्वारा पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) एवं यूनिवर्सल पेंशन स्कीम (यूपीएस) के खिलाफ़ तथा निजीकरण के विरोध में शनिवार को जिला मुख्यालय स्थित रामलीला मैदान से बढ़ौली चौक तक जोरदार रोष मार्च निकाला गया। इसके पश्चात बढ़ौली चौक पर आयोजित संक्षिप्त सभा के बाद प्रतिनिधिमंडल ने माननीय प्रधानमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी कार्यालय में सौंपा।
मार्च में जिले के विभिन्न कर्मचारी संगठनों, शिक्षकों, शिक्षणेत्तर कर्मियों और संविदा कर्मियों ने भारी संख्या में भाग लिया।
मार्च के दौरान संतोष कुमारी और वकील अहमद ने जोर देकर कहा कि जब तक पुरानी पेंशन बहाल नहीं होती, तब तक यह संघर्ष अनवरत जारी रहेगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वर्ष 2027 से पहले ओपीएस की बहाली सुनिश्चित होगी।
रंजना सिंह और सुरेश कन्नौजिया ने निजीकरण को गरीब और मध्यम वर्ग के खिलाफ एक गहरा षड्यंत्र बताते हुए कहा कि इससे भविष्य में सरकारी नौकरियां समाप्त हो जाएंगी, जिससे युवाओं को भारी संकट का सामना करना पड़ेगा।
रविभूषण सिंह और रविंद्र चौधरी ने निजीकरण को आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा बताते हुए कहा कि यदि अब इसे नहीं रोका गया, तो भविष्य में संविदा और आउटसोर्सिंग जैसी अस्थायी नौकरियां ही शेष रह जाएंगी, जिसमें परिवार पालना भी मुश्किल होगा।
अशोक त्रिपाठी, ज्योति कुमार और कौसर जहाँ ने कहा कि सरकार का काम कल्याणकारी होना चाहिए, लेकिन शिक्षा, चिकित्सा और ट्रांसपोर्ट जैसी आवश्यक सेवाओं को भी निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, जो लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। उन्होंने तर्क दिया कि अगर सरकारी नौकरियां ही नहीं रहेंगी, तो फिर सरकार का अस्तित्व किसलिए?
राजकुमार मौर्य ने प्रधानमंत्री से सवाल किया कि जब “एक राष्ट्र एक टैक्स” और “एक देश एक चुनाव” जैसी नीतियां लाई जा सकती हैं, तो “एक देश एक पेंशन” क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि जब एक राजनेता या न्यायपालिका के सदस्य एक से अधिक पेंशन ले सकते हैं, तो एक सामान्य कर्मचारी को उसका हक क्यों नहीं?
इस मौके पर कौसर जहाँ सिद्दीकी, प्रभाशंकर, सूर्यप्रकाश सिंह, कमलेश सिंह, बबिता, सर्वेश तिवारी, उमा सिंह, संतोष सिंह, राम मूर्ति, विनोद, रुद्र, बी.एन. सिंह, मनोज, अमिय, गोपाल, दिलीप, सौरभ, प्रेम सिंह, दद्दन, अजय कुशवाहा समेत सैकड़ों की संख्या में कर्मचारी मौजूद रहे।
जुलूस और सभा में उठी आवाजों ने साफ कर दिया कि सरकारी कर्मचारियों का यह आंदोलन अब सिर्फ अधिकारों की मांग नहीं, बल्कि संविधान, समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई बन चुकी है।







