अमित मिश्रा
सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्थित नलराजा मंदिर, जिसे नालेश्वर महादेव मंदिर भी कहा जाता है, केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि इतिहास, रहस्य और चमत्कारों का अद्भुत संगम है। सेमरिया गांव (नगवा ब्लॉक) स्थित यह मंदिर कर्मनाशा नदी के किनारे बसा है और सावन के महीने में यह जगह आस्था के रंग में पूरी तरह रंग जाती है।
यह मंदिर राजा नल और दमयंती की कथा से जुड़ा माना जाता है। जनश्रुति है कि प्राचीन काल में राजा नल ने इस स्थान पर शिव आराधना की थी और भगवान शिव को प्रसन्न कर दिव्य आशीर्वाद प्राप्त किया था। नलराजा के नाम पर ही इस मंदिर का नाम पड़ा, और यह शिवलिंग ‘नालेश्वर महादेव’ के रूप में विख्यात हुआ। यहां स्थित शिवलिंग की विशेषता यह है कि यह हर वर्ष थोड़ा-थोड़ा करके ऊपर उठता जा रहा है, मान्यता है कि इसकी ऊंचाई समय के साथ स्वतः बढ़ रही है।

श्रद्धालुओं में यह मान्यता भी प्रचलित है कि जो भक्त सच्चे मन से शिवलिंग को उठाने का प्रयास करता है, उसे यह अपने हाथों में उठाने में सफलता मिलती है, जबकि जो छल-कपट से प्रयास करता है, वह शिवलिंग को हिला तक नहीं पाता। इसे लोग शिव की प्रत्यक्ष कृपा मानते हैं। यह रहस्य मंदिर को और भी पवित्र व चमत्कारी बनाता है। सावन में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए आते हैं। यूपी, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश से आने वाले शिवभक्तों की भीड़ इस मंदिर को आस्था का बड़ा केंद्र बनाती है।
इस मंदिर के निर्माण की कहानी भी उतनी ही रोचक है। कहा जाता है कि गांव के एक रामदेव प्रजापति को स्वप्न में यह स्थान दिखाई दिया, जहाँ खुदाई करने पर नलराजा की मूर्ति और प्राचीन समय के सिक्के, तलवारें, बर्तन, घड़े व अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं प्राप्त हुईं। खुदाई में मिली ये वस्तुएं इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि करती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्थान कभी राजा नल का दुर्ग रहा होगा। इसके आधार पर पुरातत्व विशेषज्ञ इसे प्राचीन भारतीय सभ्यता का हिस्सा मानते हैं।
वसंत पंचमी और सावन के पावन अवसर पर यहां मेला लगता है, जिसमें दंगल जैसे पारंपरिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है। गांववासी और आगंतुक इस आयोजन को पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं। यहां की शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक वातावरण हर भक्त के हृदय में स्थायी छाप छोड़ जाता है।
नलराजा मंदिर केवल पूजा-पाठ का स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास है, जो भक्ति, संस्कृति और पुरातत्व का अद्वितीय संगम है। प्रशासन यदि इस मंदिर को और अधिक संरक्षित कर पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करे, तो यह न केवल धार्मिक बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी विश्व मानचित्र पर एक विशिष्ट स्थान बना सकता है।
यह मंदिर सोनभद्र जनपद में आस्था का प्रतीक बन चुका है। यदि आप सावन के सोमवार या वसंत पंचमी व शिवरात्रि के अवसर पर यहां दर्शन करें, तो मंदिर की दिव्यता को अनुभव कर पाएँगे।







